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Saturday, August 02, 2014

एफवाईयूपीः एक नवोन्मेषी शिक्षा प्रणाली की हत्या



दिल्ली विश्वविद्यालय और यूजीसी में लम्बी खींचतान के बाद डीयू के कुलपति ने चारवर्षीय पाठ्यक्रम को लौटा कर पुनः त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू करने का फैसला किया है. इस प्रकरण ने कोई सवाल सुलझाया नहीं है, बल्कि कई नए सवाल खड़े किए हैं। इसने उच्च शिक्षा के तंत्र में मौजूद गंभीर गड़बड़ियों को भी उजागर किया है। अगर देश के एक बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के साथ ऐसा हो सकता है, तो छोटे और देश के कोने-कोने में स्थित विश्वविद्यालयों का हाल जाना जा सकता है। कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति, सुविधापरस्ती और स्वयं-स्वार्थ सिद्धि के लिए शिक्षा व्यवस्था में इतनी जल्दी जल्दी उलटफेर की. शिक्षा में इस कदर राजनीतिक दखल दुर्भाग्यपूर्ण है. वैसे तो सरकार यह कहती रही कि वह यूजीसी और डीयू के इस मामले में दखल नहीं देगी. किंतु यह पूरी तरह स्पष्ट है कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार के दबाव में ही यूजीसी ऐसा कर रही थी. यदि ऐसा नहीं है तो फिर डेढ़ साल तक वह चुप क्यों रही.
गौरतलब है की पिछले साल 23 जुलाई को यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को एक चिट्ठी लिखकर इस कोर्स को शुरू करने की सहमति दी थी. यह एक न्यायालीय शपथ पत्र था जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि चारवर्षीय पाठ्यक्रम किसी प्रकार से शिक्षा नीति के विरुद्ध नहीं है. इतना ही नहीं यूजीसी ने डीयू में नए पाठ्यक्रम को लागू करने में मदद हेतु सीएसआईआर के महानिदेशक एस के जोशी के नेतृत्व में 5 सदस्यों की एक सलाहकार समिति गठित की थी. इस समिति ने 25 फरवरी 2014 को अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि नया पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अनुपालन नहीं करती है. और तब इस रिपोर्ट के आधार पर यूजीसी 20 जून से इसे वापस लेने हेतु लगातार डीयू पर दबाव बनाये रखती है. क्या यूजीसी रिपोर्ट के तुरंत बाद ऐसा नहीं कर सकती थी जिससे नामांकन प्रक्रिया में भी दिक्कतें नहीं आतीं. क्या एस के जोशी कमिटी सचमुच मदद के लिए बनी थी या जांच के लिए ? उसे अपनी रिपोर्ट देने में इतना लम्बा वक्त क्यों लगा ?
जाहिर है या तो यूजीसी तब यूपीए सरकार के दबाव में फैसला कर रही थी या वह अब एनडीए सरकार के इशारे पर ऐसा कर रही है जिसने अपने दिल्ली घोषणा पत्र में इसका वादा किया था. सवाल तो यूजीसी की स्वायत्तता का है. क्या यूजीसी अपने विवेक के बजाय सरकार के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचती रहेगी ? यह देश की शिक्षा संस्थानों और विद्वानों की समितियों के लिए शर्मनाक है. जैसे सीबीआई निदेशक रंजीत सिंह ने ये कहते हुए सरकार को सावधान कर दिया था की केन्द्रीय जांच ब्यूरो पिंजरे में बंद तोता नहीं है वैसे ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सरकारी दबाव और नीच राजनीति से ऊपर उठ कर काम करना चाहिए. डीयू कुलपति दिनेश सिंह की बजाय यूजीसी अध्यक्ष वेद प्रकाश को इस्तीफा दे देनी चाहिए थी क्योंकि वे अपनी संस्था की स्वायत्तता की रक्षा और विवेकपूर्ण फैसले लेने में नाकाम रहे हैं. ये वही वेद प्रकाश हैं जो एफ.वाय.यू.पी लाने के समय में भी यूजीसी के अध्यक्ष थे. उन्होंने ने ही फरवरी में दिल्ली विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव अन्तरध्वनि के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए दस मिनट तक चारवर्षीय पाठ्यक्रम और पाँच मिनट तक दिनेश सिंह की तारीफ की थी. यह सब ड्रामा नहीं तो क्या है या फिर था ?? 


एक सत्य यह भी है कि एफ.वाय.यू.पी की खिलाफत करने वाले अधिकांश लोग ना तो इस पाठ्यक्रम का हिस्सा थे न ही वे इसकी पूरी संरचना और पाठ्यक्रम से परिचित. विरोध करने वाले मुख्यतः राजनीतिक पृष्ठभूमि से थे. दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन ने बीते कुछ सालों से राजनीतिक छात्र संघों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है. इससे उन छात्र संघों में असंतोष है जो इस विरोध में सामने आ रहा है. दूसरी ओर डीयू प्रशासन ने शिक्षकों के मनमानेपन पर भी रोक लगायी है. अब उन्हें नियमित क्लास लेनी होती है. समय से आना और जाना होता है. अब उन्हें बच्चों के साथ मिलकर कठिन मेहनत करनी पड़ती है जो उनकी चाहत और आदत के विपरीत हैं. ऐसी भी बात चल रही है कि अब शिक्षकों को कालेज आते और जाते समय अंगूठे का निशान लगाना होगा. फलस्वरूप शिक्षकों में घोर असंतोष है और वे एफ.वाय.यू.पी के बहाने कुलपति का विरोध कर रहे हैं. एफ.वाय.यू.पी के तहत प्रथम वर्ष के छात्र अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. इनमें से अधिक छात्र छुट्टियों में घर गए हुए हैं. फलस्वरूप उनकी संगठित आवाज मीडिया में नहीं आ पायी. दूसरी और बीटेक के छात्र काफी परेशान थे. लेकिन यूजीसी ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए इस कोर्स को समान पाठ्यक्रम के साथ चार साल का रहने दिया है. लेकिन यह सिर्फ 2013-14 बैच के छात्रों के लिए होगा अर्थात इस सत्र से बीटेक पाठ्यक्रम में नामांकन नहीं होंगे. यह एक तरह से प्रयोग ही होगा. देखना है इस बैच के छात्र क्या गुल खिलते हैं. यदि ये छात्र पढ़ाई के साथ प्लेसमेंट में आईआईटी के समांतर महत्वपूर्ण सफलता अर्जित करते हैं तो चार वर्षीय पाठ्यक्रम पुनः विचारणीय बन जाएगा. मसलन इस बैच का परिणाम एफ.वाय.यू.पी की सार्थकता सिद्ध कर सकता है. ध्यान रहे की इनके साथ कोई निकृष्ट राजनीति ना होने पाए.    

अब बात चारवर्षीय पाठ्यक्रम की. एफ.वाय.यू.पी महात्मा गाँधी के प्रयोगात्मक शिक्षा नीति और हाथों के प्रयोग पर आधारित थी. हमारी पारंपरिक शिक्षा पद्धति केवल सैद्धांतिक रूप से समृद्ध रही है. फलस्वरूप भारत हमेशा से शोध एवं अनुसंधान में पिछड़ा रहा है. लेकिन इस नये पाठ्यक्रम में सिद्धांत के साथ परियोजना कार्य, फील्ड वर्क, प्रयोग एवं शोध को समान महत्त्व दिया गया था ताकि विद्यार्थियों को कार्य कुशल बनाया जाए. चार साल के दौरान उन्हें इंटर्नशिप के साथ साथ शोध का भी मौका मिलता. इससे हिंदुस्तान में सामूहिक कार्यों एवं शोध-प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलती. एफ.वाय.यू.पी को बाज़ार की जरूरत के अनुसार तैयार किया गया था ताकि पढ़ाई समाप्त होते ही छात्रों को नौकरी मिल सकता. संभव था इस पाठ्यक्रम का दूरगामी सकारात्मक प्रभाव होता. याद होगा राजीव गाँधी ने जब सूचना क्रांति का आह्वान किया था तो उनका भी भयंकर विरोध हुआ था.
एफ.वाय.यू.पी के तहत छात्रों को एक विषय में 20 पेपर के साथ विशेषज्ञता प्रदान की जाती. इसी विषय में उन्हें चार व्यवहारिक कोर्स के पेपर पढ़ने होते जिससे वे उस विषय से संबंधित कार्यों के लिए दक्ष और प्रशिक्षित हो सकें. साथ ही छात्रों को अपनी पसंद के दूसरे विषय में 6 पेपर पढ़ने होते. वे आगे इसमें मास्टर्स भी कर सकते थे. इसके अतिरिक्त 11 फाउंडेशन कोर्स हैं जो छात्रों को विभिन्न विषयों की आधारभूत जानकारी देते हैं. विरोधी इन कोर्सों का जम कर विरोध कर रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि आज की दुनिया मल्टीटास्किंग है अतः विद्यार्थियों को सभी विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है. इन कोर्सों का मुख्य उद्देश्य था छात्रों में हरफनमौला व्यक्तित्व के साथ उनमें नैतिकता और रचनात्मकता का विकास करना. और किसी छात्र में सृजनात्मकता विकसित करना और नैतिकता के पतन को बचाना ही शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण ध्येय है. विरोधियों का कहना था कि ये सब 12वीं तक पढ़ाया जाना चाहिए. लेकिन सच पूछिए तो ये चीज़ें जीवन भर पढ़ी पढ़ाई जाये तो भी कम ही होगी.
विरोधी मानते हैं कि इस नए पाठ्यक्रम में एक साल बेकार में बर्बाद किया जा रहा था. लेकिन पाठ्यक्रम में इन मौलिक परिवर्तनों के निवेश के लिए तो एक साल बढ़ाना ही पड़ता अन्यथा पूरा पाठ्यक्रम विद्यार्थियों के लिए बोझ बन जाता. दूसरी बात, यह सही है कि तीन की बजाय चार साल के पाठ्यक्रम में छात्रों का खर्च बढ़ जाता. ख़ासकर जो दिल्ली से बाहर के और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र हैं उनकी मुश्किलें बढ़ जातीं. लेकिन यह भी तो मानना चाहिए कि इस चार साल के पाठ्यक्रम के बाद छात्रों को आसानी से नौकरी मिल सकती थी. वैसे भी अधिकांश छात्र स्नातक के बाद या तो मास्टर्स करते हैं या फिर किसी शहर में ही ठहर कर सामान्य प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते हैं जिसमें अपेक्षाकृत अधिक ही खर्च आता है. 
नए पाठ्यक्रम की आत्मा थी शोध. भारत हमेशा से इस क्षेत्र में पिछड़ा रहा है. हमारे देश में माध्यमिक शिक्षा पाने वालों में 20 प्रतिशत से कम ही लोग उच्च शिक्षा में आ पाते हैं. और इसका भी शतांश हिस्सा ही मास्टर्स, एमफिल, पीएचडी और रिसर्च में जाते है. लेकिन इस युगांतकारी शिक्षा प्रणाली में स्नातक के छात्रों को शोध-अध्ययन का मौका मिलता. इससे ना केवल शोध की तरफ आकर्षित होने वालों की तादाद में इजाफा होता अपितु हम भी जापान की तरह तेजी से तरक्की के सपने को साकार कर पाते. संभव था कुछ वर्षों बाद हमारे यहाँ भी नोबेल पुरस्कार आने लगते.

इस बात में भी कोई दोराय नहीं इस नए पाठ्यक्रम को बिना किसी सर्वेक्षण या अध्ययन के आनन-फानन में लागू कर दिया गया. गौरतलब है कि अपने समर्थन में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने योजना आयोग की बारहवीं योजना के दस्तावेजों का सहारा लिया, जिसने सिर्फ एक पैराग्राफ में भारत की स्नातक शिक्षा की कमी को दूर करने के उपाय के रूप में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम का प्रस्ताव किया है। लेकिन यह और भी दुखद है कि इस लोकतांत्रिक देश में योजना आयोग जैसी संस्था ने भी इस नतीजे पर पहुंचने के लिए किसी सर्वेक्षण या अध्ययन की जरूरत महसूस नहीं की. नए पाठ्यक्रम के विरोधियों के इस तर्क में भी कम दम नहीं कि दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद कुलपति के कृपापात्रों से भरी पड़ी है या उनके दबाव में काम करती है. लेकिन इस बदलाव से कुलपति का कोई निजी स्वार्थ जुड़ा हो ऐसा भी तो नहीं कहा जा सकता. हाँ ऐसा हो सकता है कि उनके मन में एक नव युगप्रवर्तक कहलाने की महत्वाकांक्षा पल रही हो जिसका सीधा टक्कर अन्य लोगों की महत्वाकांक्षाओं से हुई हो जो ईर्ष्यावश इस परिवर्तन के मुखालफ़त में कूद पड़े. गाँधी और बुद्ध का यह भारत कब तक कुछ गिने चुने लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की टक्कर का दंश झेलता रहेगा. याद रहे कुलपति को इसी साल शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पद्मश्री प्रदान किया गया.
यक़ीनन एफ.वाय.यू.पी में बहुत कमियां थीं. बावजूद इसके हमारी शिक्षा प्रणाली को सुधारने का यह एक बेहतर विकल्प था जिसमें समय के साथ सुधार किया जाना चाहिए था बरक्स इसे सीधे ख़त्म करने के. कहते हैं- नदी के मध्य में पहुँच कर लौटने से बेहतर है की आगे का सफ़र जारी रखा जाए. कभी न कभी हमारे देश में वक्त की मांग पर यह पाठ्यक्रम प्रणाली पुनः दस्तक देगी और तब हमें कुछ पीछे रह जाने का दुखद एहसास भी जरूर होगा.


नन्दलाल मिश्रा जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।




Wednesday, July 23, 2014

"विप्लव"- उनकी यादोँ मेँ- अमिनेष

यह आँसु पलकों पे आने दो ज़रा
इन्हेँ ना रोको बहने दो ज़रा।


यह आँखो मे बसा प्यार हैँ
रिश्तो का एहसास हैँ।
कुछ वायदे हैँ,
कुछ कसमेँ हैँ,
वो पल हैं जब पल-पल हम साथ थे
वो बीते कल हैं जब हाथोँ- हाथ मेँ हाथ थे।
इन्हे अब बहने दो
ज़रा

इन्हेँ ना रोको,
इन्हेँ ना पोँछो,
उनके साथ चले जाने दो
ज़रा।

जो लौटने कि बात कह
अनंत के राही हो गए।
क्या है अनंत में
जो उन्हेँ भा गया?
अपनी हाथोँ जो दुनिया बसाई
उन्हे बह जाने दो
ज़रा। 


ना रोको यह दर्द
जो खुशी, जो प्यार दिल मेँ हैँ
पलकों  पे आने दो
ज़रा।

यह जिनकी अमानत हैँ
उनके साथ जाने दो
ज़रा। 

यह आँसू पलको पे आने दो ज़रा। 


अमिनेष आर्यन  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र स्नातक के प्रथम वर्ष के छात्र हैं और हाजीपुर, बिहार से ताल्लुक रखते हैं।

Monday, July 21, 2014

चंद शेर- अबूज़ैद अंसारी

बयां करता हूँ क़िस्सा जब मुहब्बत का मैं लिखता हूँ 
क़लम भी ख़ूब रोता है ,वरक़ को दर्द होता है



बहोत ख़ामोश रहता है मगर नादां नहीं है "ज़ैद" 
उसे आवाज़ बनना है जिसे सदियों सुना जाए



अब ढूँढे तो कहाँ ढूँढे पाकीज़ा मुहब्बत "ज़ैद" 
हर दिल में बसी हुई है मुहब्बत के नाम पर हवस



मुझसे नफरत का सबब क्या है मुझे बतलाओ तो "ज़ैद"
मुझे दुश्मन को भी दोस्त बनाने का हुनर आता है



यूँ हँसकर मिलने से मुझसे तेरी फ़ितरत छुप नहीं सकती 
मुझे पढ़ना ख़ूब आते हैं मुस्कुराहटों के सबक़ सारे



मेरी ग़ज़लों में असर पहले सा बाक़ी ना रहा "ज़ैद"
मुझे ये चाह है फ़िर से कोई दिल तोड़ दे मेरा



अपनी मशाल दी थी उसे उजालों के वास्ते 
तेज़ रोशनी की चाह में मेरा घर जला दिया



मुझे दुश्मन नहीं मिटा सके लाख कोशिशों के बावजूद 
"ज़ैद" उसकी एक ना पे मैं मिट रहा हूँ अब



जो आँसू पोंछने वास्ते किसी दहलीज़ पर बैठे 
वहां भी रुस्वा करने में मुझे बख़्शा ना लोगों ने




अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामियानयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.


नया भारत- आकाश

इंतेहा हो गयी इंतज़ार की! स्टेशन पर खड़े लोग भारतीय रेल को 'शुद्ध भोजपुरी' में गलियाते हुए लेट ट्रेन की राह देख रहे थे। प्रतीक्षा के बाद जब ट्रेन आई तो धक्का-मुक्की का दौर शुरू हो गया। हमने किसी तरह अपने 'वेटिंग 5' के टिकट पर खीस निपोरते हुए सीट ली। पर डर यह कि हमें ज़ल्द ही बेदखल न कर दिया जाये। 


कई छोटे-बड़े स्टेशन होते हुए ट्रेन एक अदने से स्टेशन पर आ रुकी। परन्तु वह स्टेशन ऐसे पुलकित न हुआ जैसे कोई ग़रीब मेज़बान किसी बड़े, अभिजात्य मेहमान को पाकर होता है। कारण कदाचित यहीं रहा होगा कि इस बड़ी ट्रेन को अक्सर क्रासिंग के कारणवश उस छोटे स्टेशन का आतिथ्य स्वीकारना पड़ता होगा। 

ख़ैर, सामने ही दूसरी ट्रेन लगी है। मैंने सर उठकर देखा तो दिखाई पड़ा 'केवल महिलाएं' लिखा हुआ डब्बा जिसमे न के बराबर भीड़ थी। उसमें बैठी एक हमउम्र तरुणी से नज़रें मिल गयीं और स्वाभाविक रूप से झेंप कर उसने अपना सर झुका लिया। उसके बगल में बैठा एक छोटा बच्चा, जो शायद उसका भाई रहा होगा, भुट्टे खा रहा था। बालसुलभ मुस्कान के साथ उसने मेरी ओर देखा और मैंने भी उसका ज़वाब भीनी मुस्कान के साथ दिया। 

"भईया, भईया… जूता पॉलिश करवाएंगे?"- नीचे से आ रही इस आवाज़ ने मेरी तन्द्रा को भंग कर दिया। देखा तो एक ग़रीब, फटेहाल, कमउम्र लड़का हाथ में पॉलिश व ब्रश लिए ट्रेन की फर्श पर बैठा था। बदहाली के बावज़ूद आँखों में आशा तथा चेहरे पर चमक ने उसकी क्षीणकाय काया को अलग रूप दे रखा था। 

"ये तो पढ़ने की उम्र है!"- अनजाने में मेरे भाव शब्दों का रूप ले प्रस्फुटित हो उठे।  

"पढता हूँ भईया! चौथी में हूँ। जोड़, घटा, गुना, भाग- यहाँ तक कि पढ़ना भी आता है। मैडमजी मुझे बहुत मानती हैं। "- कहते हुए उसका चेहरा गर्व से खिल उठा। मेरे हाथ से अख़बार ले पढ़ कर उसने इस बात की तस्दीक़  कर डाली। 

"तो फिर ये काम?"- हर्ष मिश्रित आश्चर्य से मैंने पूछा। 
उसका खिला चेहरा ऐसे बुझ गया जैसे बिजली टूट कर गिरी हो। 

"बापू बीमार हैं। घर में पैसा नहीं है। अब तो स्कूल भी छूट गया है। "

"ऐसे ऐसे बहुत देखे हैं!"- एक सहयात्री ने निहायत ही बेहूदाना अंदाज़ में तंज कसा। 

मेरा गुस्सा जाग उठा और उम्र का अंतर विस्मृत करते हुए मैंने उन्हें डांट पिला दी। - " आपको टांग अड़ाने का निमंत्रण किसी ने नहीं दिया। लड़का भीख नहीं मांग रहा, मेहनत की रोटी तोड़ रहा है।" शालीनता के दायरे में रह मैंने साहब को खूब खरी-खोटी सुनाई। 

लड़के से जूते पॉलिश करा एक पचास का नोट दिया जिस पर वह बाकी रुपये लौटाने लगा पर मेरे मनाने के बाद उसने पैसे रख लिए। उसकी आँखों में मैंने एक नया भारत देखा था… साधनों की तंगी के बावज़ूद आगे बढ़ने की उत्कट अभिलाषा। 

ट्रेन ने सीटी दी और गतिमान हो गयी। दूर खड़ा एक पागल ट्रेन पर पत्थर फेंके जा रहा था पर ट्रेन तो जैसे उसे मुंह चिढ़ाती, सरसराती, बलखाती, तेज़ी से काफी दूर तलक निकल आई थी। रुके हुए, ठिठके पड़े हिंदुस्तान ने शायद अब रफ़्तार पकड़ ली थी। मैंने खिड़की से झांककर देखा तो खेतों में फैली हरियाली के दर्शन हुए। अभी-अभी अंतःकरण की सरज़मीं पर बारिश  हुई थी- बारिश खुशियों की!

   आकाश कुमार जीवन मैग के प्रमुख संपादक हैं तथा सम्प्रति जामिया मिल्लिया इस्लामिया में बारहवीं विज्ञान के छात्र हैं। आप बिहार के मोतिहारी शहर से ताल्लुक रखते हैं। 

Sunday, July 20, 2014

फ़ीका जोश- नंदलाल




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथग्रहण समारोह में सार्क राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित कर अपनी विदेश नीति का शानदार आगाज़ किया था. लेकिन दो महीने बाद वह जोश फीका पड़ता नज़र आ रहा है. उनका हालिया ब्राजील दौरा मिलाजुला रहा. यह भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कूटनीतिक धाक ज़माने का पहला मौका था.

ब्राजील जाते वक्त वे बर्लिन में जर्मनी के चांसलर एंगेला मर्केल के साथ डिनर करने उतर गए लेकिन मर्केल उस समय ब्राजील में फीफा विश्वकप का फ़ाइनल मैच देख रही थी. जिससे भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी बहुत शर्मिंदगी तो झेलनी ही पड़ी है. दूसरी ओर प्रधानमंत्री के इस कदम से जापान के नाराज होने का डर है जिससे उन्होंने सबसे पहले द्विपक्षीय समझौते करने का वादा किया है.

वहीँ फोर्टलेजा में मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग की मुलाकात के बाद मोदी-पुतिन बैठक होनी थी. प्रधानमंत्री दो घंटे तक पुतिन की प्रतीक्षा करते रहे लेकिन वे नहीं आये. फिर उनकी मुलाकात अगले दिन संभव हो सकी. इस तरह रूस ने दबी जबान भारत को कुछ सन्देश दिया है. गौरतलब है की बीते दिनों रूस के साथ पाकिस्तान के संबंधों में निकटता आयी है. रूस ने पाकिस्तान के हाथों हथियार बेचने का अपना प्रतिबंध वापस ले लिया है. उधर चीन ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय अपने यहाँ ले जाने में कामयाब रहा है हालाकि इसका पहला सीईओ भारतीय होगा जो हमारे लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि तो है लेकिन पहले के अपेक्षाकृत कम.

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री मोदी की यह महत्वपूर्ण यात्रा मिलेजुले परिणामों वाली रही. हाँ, उनलोगों को निराशा जरूर हुई है जो मोदी को मनमोहन सिंह की तुलना में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अधिक प्रभावी देखने को इच्छुक थे. 
 हिन्दुस्तान के दिल्ली अंक में प्रकाशित 

प्रभात खबर पटना का प्रकाशित पत्र  


 जनसत्ता के चौपाल में प्रकाशित 


नन्दलाल मिश्रा 
 
प्रबंध संपादक - जीवन मैग www.jeevanmag.com

कार्यक्रम समन्वयक, डीयू कम्युनिटी रेडियो 

बी.टेक मानविकी (द्वितीय वर्ष),


दिल्ली विश्वविद्यालय


कश्मीर में सेना- कुलदीप कुमार

मुझे इस बार गर्मी की छुट्टियों में कोलकाता जाने का मौका मिला। वहां मेरे ठहरने की व्यवस्था आर्मी कैंप में थी। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कैंप बहुत मनभावन लगा। ये अलग बात है की तपिश के कारण परेशानियों का सामना तो करना ही पड़ा। फिर भी अपने घुमक्कड़ स्वभाव के अनुरूप लगभग सभी मशहूर जगहों यथा, बेलूर मठ, विक्टोरिया मेमोरियल, दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कोलकाता और हावड़ा ब्रिज, साइंस सिटी, कोलकाता विश्वविद्यालय और प्रेसीडेंसी कॉलेज आदि घूमने का मौका निकाल ही लिया। महलों का ये शहर अतीत को समेटे आधुनिकता की ओर अग्रसर है। मेट्रो और ट्राम तो कोलकाता की शान हैं। 

मेरे अंदर जानने की जिज्ञासा जगी कि थलसेना यहाँ कौन-कौन से कार्यों के लिए तैनात है। मुझे बताया गया कि बगल में हुगली नदी में खड़े जहाजों की देखभाल थलसेना के ही ज़िम्मे है। जाकर देखा तो बहुत पुरानी लोहे की माध्यम आकार की चार जहाजें खड़ी थीं। चार जहाजों की देखभाल के लिए लगभग ३०० सेना के जवान और प्रति साल करोड़ों का खर्च। उत्सुकता और बढ़ी तो ये भी जानना चाहा की आख़िर जहाज का यहाँ क्या काम है। पता चला कि यदि बांग्लादेश से युद्ध छिड़ा तो इसका इस्तेमाल यातायात के लिए किया जा सकता है। मुझे यह भी बताया गया की शायद ही इसकी ज़रुरत पड़े। 

सेना के लगभग सभी जवान तीन या छह साल कश्मीर में गुज़ार चुके थे। मसला जब कश्मीर का चला तब लगभग सभी जवानों की याद कड़वी ही थी। कश्मीर में सेना का ये हाल सुनकर मुझे भी सोचने पर विवश होना पड़ा। सद्भावना मिशन के तहत कश्मीरी लड़कों की पढाई की समुचित व्यवस्था आर्मी स्कूल में- वो भी मुफ्त। मरीज़ों के लिए सेना अस्पताल बिलकुल फ्री। छह महीने राशन फ्री  छह महीने नाम मात्र के पैसे पर। आर्मी वालों के लिए भी कश्मीर में अलग नियम-कानून। सेना के जवानों की बन्दूक की नाल नीचे से ऊपर नहीं उठनी चाहिए। भीड़ में ग़र कोई आतंकवादी दिख जाये तो मारना नहीं है हाँ, अकेले में दिखे तो सिंगल शॉट में मारना है और वो गोली भी आतंकवादी को ही लगनी चाहिए। किसी आम आदमी को लग गयी तो सेना के उस जवान को अपनी छुट्टियों में सिविल कोर्ट जा कर मुकदमा लड़ना पड़ेगा। फ़ौज़ की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। मतलब साडी छुट्टियां बर्बाद, विद्रोह का सामना अलग से। प्रायः सेना में गलती करने वाले का कोर्ट मार्शल अंदर ही होता है पर कश्मीर के मसलों में नहीं। जवानों को अलगाववादियों के पत्थरों की मार सहनी पड़ती है और उस स्थिति में भी छिपकर जान बचने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं होता। पेट्रोलिंग रात १ से ४ के बीच होती है ताकि अलगाववादियों के प्रकोप का सामना न करना पड़े। एक जवान ने तो यहाँ तक कहा कि कुछेक लोग आतंकवादियों को दामाद की तरह घर में रखते हैं। सेना ये सारी बातें जानते हुए भी कुछ नहीं कर पाती। आतंकवादियों के लाश तक की स्थानीय लोग मांग कर देते हैं। एक सैनिक ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारी कहा करते हैं कि बेटा कश्मीर आये हो तो मौत से खेलना तो है ही किसी तरह गाड़ी में छिपकर तीन साल का समय निकल लो, फायदे में रहोगे। 

कश्मीर में सेना द्वारा इतनी सुविधाएँ उपलब्ध करने के बावजूद ऐसी दुर्भावना बहुत ठेस पहुंचती है। सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद को अलगाववादियों का प्रश्रय मिला हुआ है। एसी में रहने वाले और कारों पर चलने वाले सिविल सोसाइटी के भद्रजन मानवाधिकारों पर होहल्ला तो बहुत मचाते हैं पर हकीकत में वे यथार्थ से बहुत दूर हैं। क्या मानवाधिकारों के घेरे में बस वे अलगाववादी आते हैं जिन्होंने हिंसा से घाटी को नर्क  बना रखा है? क्या उन सैनिकों का कोई मानवाधिकार नहीं जो अपनी जान की बाज़ी लगा माँ भारती के अखंडता की रक्षा कर रहे हैं? कश्मीर की समस्या का समाधान नितांत आवश्यक है। 

कुलदीप कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप जामिया मिल्लिया इस्लामिया में विज्ञान संकाय से कक्षा बारहवीं के छात्र हैं तथा मोतिहारी, बिहार से ताल्लुक रखते हैं। 

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