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नोकियाः अस्त होता सूर्य

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Sunday, August 31, 2014

Photos of the Month- June-July 2014

 Jeevan Mag 6
Photo Credits-

1) Snowman- Umair Altaf Padder, Kulgam, Jammu & Kashmir 
Class XII Commerce, Jamia Millia Islamia, New Delhi

2) Mountain Landscape- Karan Negi, Shimla (Himachal Pradesh)

3) Manual artwork by kids-  Abha Ojha, Jaipur (Rajasthan)

4) Akash Kumar- Mallik Altaf, Srinagar (Jammu & Kashmir)
Class XII Arts, Jamia Millia Islamia, New Delhi

5) Rain in Indian Plains- Akash Kumar, Motihari (Bihar) Editor-in- Chief,

6) Wildlife- Chaitanyaa Sharma, Jaipur (Rajasthan)

नज़्म- अबुज़ैद अंसारी

अभी तू रुक गया है क्यों
तुझे तो दूर जाना है 

जहाँ कोई नहीं पहुँचा
वहाँ तेरा ठिकाना है 
अभी ना हार हिम्मत तू 
तू फिर से चल रुख-ए-मंज़िल 

सफ़र काँटों भरा है 
इन पे तुझको चल के जाना है 
तेरा मेयार औरों से तो 
ज़्यादा है नहीं लेकिन 

बिना पंखों के फिर भी 
आसमां छू कर दिखाना है 
अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.

Tuesday, August 26, 2014


बातों ही बातों में जो बात, बात बनते बनते बात बनकर बात बन जाती है उस बात के पीछे भी कोई बात हो अथवा ना हो किंतु परन्तु  के  संदर्भ में उस बात को बात बनाकर बातों ही बातों में उड़ा देना भी एक बात है. इसका मतलब ये हुआ कि हरेक बात बात बनें या ना बनें लेकिन बातों ही बातों में बात बनकर उड़ जाने के तत्पश्चात उस बात का निरूपण इस बात के साथ किया जाना चाहिए कि बात फिर से किसी बात को लेकर बातों ही बातों में बात ना बन जाए. इक बात मैं भी आपको बता दूँ कि जो बात मैं बाताऊँगा उस बात का सम्बन्ध भी किसी बात से होना उतना ही लाजमी है जितना कि इस बात का सम्बन्ध उस बात से. अब ये भी सत्य है कि जब वो बात भी किसी ना किसी बात से ही उभरी हुई है तो क्यूँ ना उस बात को भी इस बात के साथ बातों ही बातों में बात बनाकर उड़ा दिया जाए. खैर . . . मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है . . . और दूसरे लफ़्जो में ये भी इक बात ही है.  

 कुमार शिवम् मिश्रा जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं. आप कॉमर्स कॉलेज, पटना में अंग्रेजी स्नातक (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं.

Uncle Tichkoo 1

Uncle Tichkoo is a wise old man but lately with age, he appears to suffer from Amnesia. He has lost the grasping power but is never short of wise advice at the right time. He is clever and sometimes it appears that he is faking his amnesia. Tichkoo comprises of 2 words (Tich=slightly and Koo=cool). This character is a creation of Divya Suri who is a student of class 5th of Queen’s Valley School. From now on; Jeevan Mag will publish cartoon strips of Uncle Tichkoo in every issue.  © Divya Suri
Following strips are from Jeevan Mag 6 (June-July 2014)

Monday, August 25, 2014

Debate: Israel-Palestine conflict: Parvez Alam & Aminesh Aryan

The Big Debate: Israel-Palestine conflict

In the name of self-defense     
                                   -Parvez Alam

On 12th June 2014, Israel accused Hamas of kidnapping 3 Israeli teens in Gush Etzion, west bank of Gaza. In return they arrested 530 Palestinian citizens. Israel launched a heavy air-strike on Gaza in the name of 'Defending itself' and then their blood-thirsty troops entered Palestinian land murdering everyone they get in the way. They call it self-defense. They defended themselves by murdering 2000 civilians including 500+ children till now. What an appreciable self-defense it is? They're accusing Hamas of killing their 'innocent civilians ' who're living on looted lands of Palestine since 1948. Was the burning of thousand villages then a pre-act of self-defense? Because Hamas wasn't even in existence back then. Maybe possible. And talking about ruthless killing perhaps butchering of people on streets, in hospitals, in mosques, ambulances etc. is not new for the people of Palestine. They've to be ready for the worst every morning they wake up.

The world esp. the western nations have funded Israel in their bloody act of killing innocents following the theory of Zionism which is itself discarded by most of Jews. And after every such massacre of thousands of Palestinians they say they're willing to set up truce, truce on what price?                                                                       

Palestinians don't want truce, they want their land back, they want to live in their country without any fear of getting slaughtered any minute, and they want to see their kids grow playing instead of getting bombed in the schools, playgrounds, beaches. Can anyone answer why Palestine is not allowed to keep an army of itself like any other country? And that's the reason they're fighting.That's the reason Hamas is fighting. That's the reason PFLP (People's Front for Liberation of Palestine) & Maoist party of Palestine is fighting.They're not terrorists as branded by west controlled media but they're freedom fighters for their citizens. They're fighting for the liberation and freedom of their land, which belongs to them only. They may not have as heavy artillery as Israel but they'll win because people's resistance can never be defeated.What could be a better example of this than Vietnam?                                                                

The world's 'SUPERPOWERS' maybe supporting Israel but people aren't. The world has never seen so many protests across the globe in recent times. Many celebrities like Ronaldo, Mesut ozïl, Al puccino, John Berger, Nobel laureate Tutu and many to add on the list are standing for the truth, for the freedom of Palestine.

The BDS movement has started to show its effects. According to reports, Israel's economy has lost 950 million dollars in last 2 months. But there's still a long way to go, we need to continue the boycott and Palestine needs to keep their resistance going. They'll win, sooner or late. Because they have nothing to lose now and a message to all the martyrs, "your sacrifice will never be wasted; the day is near when your future generation will breathe freely ".       

And for all the supporters of Israel ,
America's intellectual Noam Chomsky's words seems perfect , " People who call themselves supporters of Israel are actually supporters of its moral degeneration and ultimate destruction." 

One of my Palestinian friend said , " First they said , Palestinian fight like heroes , now they'll say , heroes fight like Palestinians. " 

(Parvez Alam is a student of Class XII Science at Jamia Millia Islamia, New Delhi. Basically from Chhapra in Bihar, Parvez subscribes to communist ideology.) 

आतंक के विरुद्ध इज़रायल की मुहिम

 -अमिनेष आर्यन

इज़रायल दुनिया का एकमात्र यहूदी राष्ट्र है, ये वो यहूदी हैं जो सदियों दुनिया द्वारा सताये जाते रहे हैँ। पूर्व मेँ इनके पवित्र मंदिर दो बार रोमन साम्राज्य द्वारा ध्वस्त कर दिए गए और इनपर असभ्य होने का आरोप लगा, ईसाई इन्हेँ नीच मानते थे और इस तरह यहूदियों को यूरोप से निकाल दिया गया। मध्य काल मे अरब प्रायद्वीप मेँ इस्लाम के साथ संघर्ष ने यहूदियों को अपने ख़ुद के राष्ट्र के लिए सोचने को मज़बूर कर दिया। कालांतर मे हिटलर के नाज़ीवाद ने किस तरह यहूदियों का कत्लेआम किया , जिसे दुनिया आज महाविध्वंस के नाम से जानती हैँ। यहूदियों के मातृ स्थान उनसे छीन लिए गए और उन्हेँ दर-दर भटकने के लिए मज़बूर किया गया। वक़्त के साथ यहूदियों ने भारत, अमेरिका जैसे नवसृजित देशों मेँ शरण ली। महान साइंटिस्ट अल्बर्ट आइंस्टाइन भी उनमें से एक थे जो हिटलर की नज़रों से बच कर अमेरिका चले गए। जेरुसलम को यहूदी अपना घर मानते हैँ, यहीँ पर उनका वो पवित्र मंदिर था। यह स्थान इस्लाम के लिए भी पवित्र है पैगंबर हजरत मोहम्मद यहीँ से स्वर्ग की यात्रा पर गए थे और संयोगवश ईसा मसीह का जन्म भी यहीँ हुआ इसलिए यह ईसाईयत का भी पवित्र स्थान हैँ। दोनों ही धर्म संसार के विभिन्न क्षेत्रोँ मे प्रसारित और प्रतिष्ठित भी हैँ जबकि यहूदियों को अपने देश के लिए सदियोँ लड़ना पड़ा तीन धर्मयुद्ध हुए और इस तरह जेरुसलम धर्मो का रणक्षेत्र बन गया। अंत में वर्ष 1948 में इज़रायल के नाम से एक अलग यहूदी राष्ट्र की घोषणा की गई और जेरुसलम इज़रायल राष्ट्र की राजधानी बनी। वक़्त के साथ इज़रायल ने समृद्धि-संपन्नता-विकास-प्रतिष्ठा-शक्ति हासिल कि और मध्य-पूर्व एशिया का शक्तिशाली देश बन कर उभरा। यहाँ तक कि वो युद्ध हथियारों के सबसे बड़े निर्यातकों में से है। आज जब आतंकी हमले के ख़िलाफ उसने कारवाई शुरू कि तो दो-दो विश्वयुद्ध लड़ चुके देश मानवता कि दुहाई दे रहे है? क्या अपनी आत्मरक्षा करना गलत हैँ? अपनी गजब की रक्षात्मक प्रणाली से दुश्मन के हमलोँ को नाकाम कर अगर वो अपने नागरिकों की रक्षा कर सकने में सक्षम है तो क्या वो गलत है? या फिर वो इसलिए गलत हैँ कि इज़रायली नागरिक इस युद्ध मे हताहत नहीँ हो रहे? हमास-इज़रायल युद्ध कोई आपसी रंजिश नहीँ बल्कि उस परंपरा की बानगी है जिसमेँ धर्म को राष्ट्र का आधार माना जाता हैँ और उस राजनीतिक साजिश की देन जिसमेँ इज़रायल से अलग एक फिलिस्तीनी राज्य की घोषणा की गई। ताज्जुब की बात देखिए संयुक्त राष्ट्र जैसे भारी-भरकम जमघट ने जेरूसलम को ही फिलिस्तीन कि राजधानी स्वीकार किया जो इज़रायल की अधिकारिक राजधानी हैँ। आख़िर क्यूँ? तब तो ऐसा लगता है जैसे यह युद्ध उपहार स्वरूप दिया गया हो । दुनिया बखूबी जानती हैँ कि गाजा पट्टी के क्या हालात हैँ गाजा पट्टी पर नियंत्रण रखने वाली हमास ने एक अलग इस्लामिक स्टेट के नाम पर  जो आतंक फैला रखा है वो उस इलाके कि बदकिस्मती है कि उसकी अपनी ही निर्वाचित सरकार उनका विकास नहीँ चाहती, इज़रायल पर बार-बार हमले कर हमास ने यह साबित किया है कि पवित्र इस्लाम के नाम पर तुच्छ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए पूरे फिलिस्तीनी राज्य को युद्ध मेँ झोँकना चाहते है। यह उसी तरह है जैसे अफगानिस्तान मे तालिबान और गुलाम कश्मीर के अलगाववादी आतँकी। इसलिए इज़रायल आतंक के ख़िलाफ युद्ध कर रहा हैँ ना कि फिलिस्तीन के खिलाफ। इस बात का यह सबूत है की उसी फिलिस्तीन के वेस्ट बैँक इलाके जो हमास के शासन से मुक्त हैं और जहाँ शान्ति छाई है। भारत- इज़रायल संबंध भारत को रक्षा क्षेत्र मे सक्षम बनाती हैँ। ऐसे मे काँग्रेस चाहती है कि हम इज़रायल का विरोध करें जबकि उसी की सरकार में इज़रायल के साथ कई अहम रक्षा समझौते हुए। हमारी अंतर्राष्ट्रीय  नीति भले ही शांतिमूलक हो लेकिन भारत का इस मामले में तटस्थ बने रहना ही लाभदायक हैँ।

(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। मज़ेदार बात यह है कि मूल रुप से बिहार के हाजीपुर से संबंध रखने वाले अमिनेष भी कम्युनिस्ट विचारधारा में विश्वास रखते हैं। अमिनेष ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते तथापि नास्तिक हैं।)

The Sixth Edition of Jeevan Mag coming soon... Like Us to be the first to grab it

The Road Not Taken- Robert Frost

A poetry masterpiece

Two roads diverged in a yellow wood,
    And sorry I could not travel both
    And be one traveler, long I stood
  And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth;

    Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim,
 Because it was grassy and wanted wear;
    Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,

    And both that morning equally lay
    In leaves no step had trodden black.
    Oh, I kept the first for another day!
Yet knowing how way leads on to way,
    I doubted if I should ever come back.

    I shall be telling this with a sigh
    Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I—
    I took the one less traveled by,
And that has made all the difference.

Robert Frost

Sunday, August 24, 2014

कार्टून कोना - अच्छे दिन कब आएंगे...?- अनिल भार्गव

जीवन मैग के छठे अंक में प्रकाश्य कार्टूनिस्ट अनिल भार्गव का कार्टून

Firstly & Foremostly (Editorial- June-July 2014 Issue)

Sixth Edition of Jeevan Mag coming soon... Be the first to Grab it....Like us on Facebook

Hello friends,

Team JeevanMag is here with the sixth edition of this unique initiative- India’s first online bilingual magazine by students. It’s 1 AM & I am busy writing (Directly typing) this editorial note. I forgot to write this special stuff at time & well, you can see what the outcome is…Time and Tide wait for none.
We plan to go bimonthly now & for that we are restructuring our organisation. We are aspiring, setting new goals & then gradually achieving them. Abuzaid Ansari is now the associate editor of Jeevan Mag & that’s a big change. I met this guy in school library & the interlocution turned out to be profound & delightful to both of us. Apart from being a pragmatic poet, he has got managerial skills too. I am sure that Nandlal Bhaiya (Executive Editor, Jeevan Mag) would get an exceptional companion in him. I can bet that he is making future plans for Jeevan Mag even as you read this issue.
Change is the law of nature & that’s what happenned in the political arena too. The recent Loksabha elections gave a clear majority to BJP-led NDA making Mr. Narendra Modi the Prime minister of the country. The Bharatiya Janata Party got majority on its own making it solely responsible for whatever will happen in the power blocks of Delhi. Historical mandate, unputdownable government & Great responsibility!!! It has been more than 2 monthes of the government & meanwhile, a great volume of water would have flown through the Ganges. The track record of the government has been an average one & Mr. PM understands that the commonfolk is watching out his each & every move.

This time also Team JeevanMag has tried to provide you with a complete edutaining package. From poems to memoirs & from debates to stories, we have it all for you. Mark Twain once said, “I CAN LIVE FOR TWO MONTHES ON A GOOD COMPLIMENT.” Compliment is the essential fuel to keep Jeevan Mag going on. Feel free to give us your suggestions. Mail me at-

Affectionately Yours,
Akash Kumar

Saturday, August 02, 2014

एफवाईयूपीः एक नवोन्मेषी शिक्षा प्रणाली की हत्या

दिल्ली विश्वविद्यालय और यूजीसी में लम्बी खींचतान के बाद डीयू के कुलपति ने चारवर्षीय पाठ्यक्रम को लौटा कर पुनः त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू करने का फैसला किया है. इस प्रकरण ने कोई सवाल सुलझाया नहीं है, बल्कि कई नए सवाल खड़े किए हैं। इसने उच्च शिक्षा के तंत्र में मौजूद गंभीर गड़बड़ियों को भी उजागर किया है। अगर देश के एक बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के साथ ऐसा हो सकता है, तो छोटे और देश के कोने-कोने में स्थित विश्वविद्यालयों का हाल जाना जा सकता है। कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति, सुविधापरस्ती और स्वयं-स्वार्थ सिद्धि के लिए शिक्षा व्यवस्था में इतनी जल्दी उलटफेर की. शिक्षा में इस कदर राजनीतिक दखल दुर्भाग्यपूर्ण है. वैसे तो सरकार यह कहती रही कि वह यूजीसी और डीयू के इस मामले में दखल नहीं देगी. किंतु यह पूरी तरह स्पष्ट है कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार के दबाव में ही यूजीसी ऐसा कर रही थी. यदि ऐसा नहीं है तो फिर डेढ़ साल तक वह चुप क्यों रही.
गौरतलब है की पिछले साल 23 जुलाई को यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को एक चिट्ठी लिखकर इस कोर्स को शुरू करने की सहमति दी थी. यह एक न्यायालीय शपथ पत्र था जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि चारवर्षीय पाठ्यक्रम किसी प्रकार से शिक्षा नीति के विरुद्ध नहीं है. इतना ही नहीं यूजीसी ने डीयू में नए पाठ्यक्रम को लागू करने में मदद हेतु सीएसआईआर के महानिदेशक एस के जोशी के नेतृत्व में 5 सदस्यों की एक सलाहकार समिति गठित की थी. इस समिति ने 25 फरवरी 2014 को अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि नया पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अनुपालन नहीं करती है. और तब इस रिपोर्ट के आधार पर यूजीसी 20 जून से इसे वापस लेने हेतु लगातार डीयू पर दबाव बनाये रखती है. क्या यूजीसी रिपोर्ट के तुरंत बाद ऐसा नहीं कर सकती थी जिससे नामांकन प्रक्रिया में भी दिक्कतें नहीं आतीं. क्या एस के जोशी कमिटी सचमुच मदद के लिए बनी थी या जांच के लिए ? उसे अपनी रिपोर्ट देने में इतना लम्बा वक्त क्यों लगा ?
जाहिर है या तो यूजीसी तब यूपीए सरकार के दबाव में फैसला कर रही थी या वह अब एनडीए सरकार के इशारे पर ऐसा कर रही है जिसने अपने दिल्ली घोषणा पत्र में इसका वादा किया था. सवाल तो यूजीसी की स्वायत्तता का है. क्या यूजीसी अपने विवेक के बजाय सरकार के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचती रहेगी ? यह देश की शिक्षा संस्थानों और विद्वानों की समितियों के लिए शर्मनाक है. जैसे सीबीआई निदेशक रंजीत सिंह ने ये कहते हुए सरकार को सावधान कर दिया था की केन्द्रीय जांच ब्यूरो पिंजरे में बंद तोता नहीं है वैसे ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सरकारी दबाव और नीच राजनीति से ऊपर उठ कर काम करना चाहिए. डीयू कुलपति दिनेश सिंह की बजाय यूजीसी अध्यक्ष वेद प्रकाश को इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि वे अपनी संस्था की स्वायत्तता की रक्षा करने और विवेकपूर्ण फैसले लेने में नाकाम रहे हैं. ये वहीँ वेद प्रकाश हैं जो एफ.वाई.यू.पी लाने के समय में भी यूजीसी के अध्यक्ष थे. इन श्रीमान ने ही फरवरी में दिल्ली विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव अन्तरध्वनि के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए दस मिनट तक चारवर्षीय पाठ्यक्रम और पाँच मिनट तक दिनेश सिंह की तारीफ की थी. यह सब ड्रामा नहीं तो क्या है या फिर था ?? 

एक सत्य यह भी है कि एफवाईयूपी की खिलाफत करने वाले अधिकांश लोग ना तो इस पाठ्यक्रम का हिस्सा थे न ही वे इसकी पूरी संरचना और पाठ्यक्रम से परिचित थे. विरोध करने वाले मुख्यतः राजनीतिक पृष्ठभूमि से थे. दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन ने बीते कुछ सालों से राजनीतिक छात्र संघों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है. इससे उन छात्र संघों में असंतोष है जो इस विरोध में सामने आ रहा है. दूसरी ओर डीयू प्रशासन ने शिक्षकों के मनमानी पर भी रोक लगायी है. अब उन्हें नियमित क्लास लेना होता है. समय से आना और जाना होता है. अब उन्हें बच्चों के साथ मिलकर कठिन मेहनत करनी पड़ती है जो उनकी चाहत और आदत के विपरीत हैं. ऐसी भी बात चल रही है कि अब शिक्षकों को कालेज आते और जाते समय अंगूठे का निशान लगाना होगा. फलस्वरूप शिक्षकों में घोर असंतोष है और वे एफ.वाय.यू.पी के बहाने कुलपति का विरोध कर रहे हैं. एफ.वाय.यू.पी के तहत प्रथम वर्ष के छात्र अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. इनमें से अधिक छात्र छुट्टियों में घर गए हुए हैं. फलस्वरूप उनकी संगठित आवाज मीडिया में नहीं आ पायी. दूसरी और बीटेक के छात्र काफी परेशान थे. लेकिन यूजीसी ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए इस कोर्स को समान पाठ्यक्रम के साथ चार साल का रहने दिया है. लेकिन यह सिर्फ 2013-14 बैच के छात्रों के लिए होगा अर्थात इस सत्र से बीटेक पाठ्यक्रम में नामांकन नहीं होंगे. यह एक तरह से प्रयोग ही होगा. देखना है इस बैच के छात्र क्या गुल खिलते हैं. यदि ये छात्र पढ़ाई के साथ प्लेसमेंट में आईआईटी के समांतर महत्वपूर्ण सफलता अर्जित करते हैं तो चार वर्षीय पाठ्यक्रम पुनः विचारणीय बन जाएगा. मसलन इस बैच का परिणाम एफ.वाय.यू.पी की सार्थकता सिद्ध कर सकता है. ध्यान रहे की इनके साथ कोई निकृष्ट राजनीति ना होने पाए.    

अब बात चारवर्षीय पाठ्यक्रम की. एफवाईयूपी महात्मा गाँधी के प्रयोगात्मक शिक्षा नीति और हाथों के प्रयोग पर आधारित थी. हमारी पारंपरिक शिक्षा पद्धति केवल सैद्धांतिक रूप से समृद्ध रही है. फलस्वरूप भारत हमेशा से शोध एवं अनुसंधान में पिछड़ा रहा है. लेकिन इस नये पाठ्यक्रम में सिद्धांत के साथ परियोजना कार्य, फील्ड वर्क, प्रयोग एवं शोध को समान महत्त्व दिया गया था ताकि विद्यार्थियों को कार्य कुशल बनाया जाए. चार साल के दौरान उन्हें इंटर्नशिप के साथ साथ शोध का भी मौका मिलता. इससे हिंदुस्तान में सामूहिक कार्यों एवं शोध-प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता. एफवाईयूपी को बाज़ार की जरूरत के अनुसार तैयार किया गया था ताकि पढ़ाई समाप्त होते ही छात्रों को नौकरी मिल सके. संभव था इस पाठ्यक्रम का दूरगामी सकारात्मक प्रभाव होता. याद होगा राजीव गाँधी ने जब सूचना क्रांति का आह्वान किया था तो उनका भी भयंकर विरोध हुआ था.
एफवाईयूपी के तहत छात्रों को एक विषय में 20 पेपर के साथ विशेषज्ञता प्रदान की जाती. इसी विषय में उन्हें चार व्यवहारिक कोर्स के पेपर पढ़ने होते जिससे वे उस विषय से संबंधित कार्यों के लिए दक्ष और प्रशिक्षित हो सकें. साथ ही छात्रों को अपनी पसंद के दूसरे विषय में 6 पेपर पढ़ने होते. वे आगे इसमें मास्टर्स भी कर सकते थे. इसके अतिरिक्त 11 फाउंडेशन कोर्स हैं जो छात्रों को विभिन्न विषयों की आधारभूत जानकारी देते हैं. विरोधी इन कोर्सों का जम कर विरोध कर रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि आज की दुनिया मल्टीटास्किंग है अतः विद्यार्थियों को सभी विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है. इन कोर्सों का मुख्य उद्देश्य था छात्रों में हरफनमौला व्यक्तित्व के साथ उनमें नैतिकता और रचनात्मकता का विकास करना. और किसी छात्र में सृजनात्मकता विकसित करना और नैतिकता के पतन को बचाना ही शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण ध्येय है. विरोधियों का कहना था कि ये सब 12वीं तक पढ़ाया जाना चाहिए. लेकिन सच पूछिए तो ये चीज़ें जीवन भर पढ़ी पढ़ाई जाये तो भी कम ही होगी.
विरोधी मानते हैं कि इस नए पाठ्यक्रम में एक साल बेकार में बर्बाद किया जा रहा था. लेकिन पाठ्यक्रम में इन मौलिक परिवर्तनों के निवेश के लिए तो एक साल बढ़ाना ही पड़ता अन्यथा पूरा पाठ्यक्रम विद्यार्थियों के लिए बोझ बन जाता. दूसरी बात, यह सही है कि तीन की बजाय चार साल के पाठ्यक्रम में छात्रों का खर्च बढ़ जाता. ख़ासकर जो दिल्ली से बाहर के और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र हैं उनकी मुश्किलें बढ़ जातीं. लेकिन यह भी तो मानना चाहिए कि इस चार साल के पाठ्यक्रम के बाद छात्रों को आसानी से नौकरी मिल सकती थी. वैसे भी अधिकांश छात्र स्नातक के बाद या तो मास्टर्स करते हैं या फिर किसी शहर में ही ठहर कर सामान्य प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते हैं जिसमें अपेक्षाकृत अधिक ही खर्च आता है. 
नए पाठ्यक्रम की आत्मा थी शोध. भारत हमेशा से इस क्षेत्र में पिछड़ा रहा है. हमारे देश में माध्यमिक शिक्षा पाने वालों में 20 प्रतिशत से कम ही लोग उच्च शिक्षा में आ पाते हैं. और इसका भी शतांश हिस्सा ही मास्टर्स, एमफिल, पीएचडी और रिसर्च में जाते है. लेकिन इस युगांतकारी शिक्षा प्रणाली में स्नातक के छात्रों को शोध-अध्ययन का मौका मिलता. इससे ना केवल शोध की तरफ आकर्षित होने वालों की तादाद में इजाफा होता अपितु हम भी जापान की तरह तेजी से तरक्की के सपने को साकार कर पाते. संभव था कुछ वर्षों बाद हमारे यहाँ भी नोबेल पुरस्कार आने लगते.

इस बात में भी कोई दोराय नहीं इस नए पाठ्यक्रम को बिना किसी सर्वेक्षण या अध्ययन के आनन-फानन में लागू कर दिया गया. गौरतलब है कि अपने समर्थन में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने योजना आयोग की बारहवीं योजना के दस्तावेजों का सहारा लिया, जिसने सिर्फ एक पैराग्राफ में भारत की स्नातक शिक्षा की कमी को दूर करने के उपाय के रूप में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा है। लेकिन यह और भी दुखद है कि इस लोकतांत्रिक देश में योजना आयोग जैसी संस्था ने भी इस नतीजे पर पहुंचने के लिए किसी सर्वेक्षण या अध्ययन की जरूरत महसूस नहीं की. नए पाठ्यक्रम के विरोधियों के इस तर्क में भी कम दम नहीं कि दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद कुलपति के कृपापात्रों से भरी पड़ी है या उनके दबाव में काम करती है. लेकिन इस बदलाव से कुलपति का कोई निजी स्वार्थ जुड़ा हो ऐसा भी तो नहीं कहा जा सकता. हाँ ऐसा हो सकता है कि उनके मन में एक नव युगप्रवर्तक कहलाने की महत्वाकांक्षा पल रही हो जिसकी सीधी टक्कर अन्य लोगों की महत्वाकांक्षाओं से हुई हो जो ईर्ष्यावश इस परिवर्तन के मुखालफ़त में कूद पड़े. गाँधी और बुद्ध का यह भारत कब तक कुछ गिने चुने लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की टक्कर का दंश झेलता रहेगा. याद रहे कुलपति को इसी साल शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पद्मश्री प्रदान किया गया.
यक़ीनन एफवाईयूपी में बहुत कमियां थीं. बावजूद इसके हमारी शिक्षा प्रणाली को सुधारने का यह एक बेहतर विकल्प था जिसमें समय के साथ सुधार किया जाना चाहिए था बरक्स इसे सीधे ख़त्म करने के. कहते हैं- नदी के मध्य में पहुँच कर लौटने से बेहतर है की आगे का सफ़र जारी रखा जाए. कभी न कभी हमारे देश में वक्त की मांग पर यह पाठ्यक्रम प्रणाली पुनः दस्तक देगी और तब हमें कुछ पीछे रह जाने का दुखद एहसास भी जरूर होगा.

नन्दलाल मिश्रा जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

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