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Sunday, 28 June 2015

बदलते बर्मा में राह तलाशता चीन

हाल ही में बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता और नोबेल (शांति) विजेता आंग सान सू की ने चीन की राजनीतिक यात्रा की है. चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के आमंत्रण पर यह उनकी पहली चीनी यात्रा थी. इस पाँच दिवसीय (दस से चौदह जून) यात्रा ने वैश्विक मीडिया में खूब सुर्खियाँ बटोरी.

गौरतलब है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सू की से मुलाक़ात करने के लिए प्रोटोकॉल तोड़कर उनका स्वागत किया. कुछ वर्षों पूर्व तक यही चीन बर्मा में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाली सू की की नज़रबंदी का हिमायती था. वहीं दूसरी ओर चीन में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले नोबेल (शांति) विजेता लेखक लू श्याबाओ आज भी एक कैदी का जीवन जीने को बाध्य हैं. उन्हें रिहा करने की पश्चिमी देशों की अपील को चीन बार-बार ठुकराता रहा है. सू की का बर्मा में वही स्थान रहा है जो चीन में लू का है. जाहिर है चीन अपने राजनीतिक और सामरिक हितों को साधने के लिए किसी भी वैश्विक विचारधारा और राजनीतिक हस्ती (सत्ताधारी या गैर-सत्ताधारी) से हाथ मिला सकता है. चीनी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा- “दुनिया इस भ्रम में न रहे कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना की पहल से दोनों देशों के रिश्तों में कमी आई है. दोनों देश पारस्परिक साझेदारी से क्षेत्रीय विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं.” दूसरे नज़रिए से देखें तो पहले से ठीक विपरीत आज चीन औचित्यपूर्ण उदारवादी सोच की ओर अग्रसर हो रहा है. लेकिन इस पर भरोसा करना असहज है और खासकर भारत के लिए तो मुश्किल भी.

चीन बर्मा में सैन्य शासन का पुरज़ोर समर्थक रहा है. लेकिन फिलहाल बर्मा की सेमी-सिविलियन सरकार के काल में दोनों देशों के संबंध कमजोर हुए हैं. जनता के भारी विरोध के बाद थेन सेन सरकार ने चीन की तीन महत्वाकांक्षी मूलभूत ढांचा विकास परियोजनाओं- लेप्टाडाँग तांबा खदान, मित्सोने पनबिजली बाँध और रक्खिने (बर्मा)- कुनमिंग (चीन) रेलमार्ग विकास परियोजना को रद्द कर दिया था. जिससे बर्मा में चीनी निवेश पिछले 4 वर्षों में 8 अरब डॉलर (2011 में) से घट कर महज 50 करोड़ डॉलर (2015 में) रहा गया है. इससे बर्मा में चीन के बढ़ते प्रभाव को जबरदस्त झटका लगा है. वहीं चीन बीते चार महीनों से बर्मा सीमा पर कोकांग क्षेत्र में हो रहे जातीय विद्रोह और पनपते उग्रवाद से भी परेशान है.
सू की से मुलाक़ात में चीनी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने उन्हें अपने पक्ष में करने की भरसक कोशिश की है. म्यांमार में इस साल के अंत तक आम चुनाव होने हैं. संभव है, इसमें सू की के नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी को बहुमत प्राप्त हो. चीन इस संभावित जीत में अभी से ही अपनी संभावनाओं की तलाश कर रहा है. वह बर्मा के लोगों का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए सू की की लोकप्रियता का सहारा लेना चाहता है.

दूसरी तरफ बर्मा में सैन्य शासन की स्थापना (1962-63) से ही भारत और बर्मा के रिश्तों में ठहराव आ गया. 1993 के बाद पीवी नरसिंहाराव और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के प्रयासों से म्यांमार की चीन पर निर्भरता घटी और बाकी दुनिया से अलगाव भी कम हुआ. वहीं विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र भारत ने कभी सू की और उनकी पार्टी के लोकतांत्रिक संघर्ष का भी मुखर रूप से समर्थन भी नहीं किया. सू की का भारत से बस इतना रिश्ता है कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं. क्या इस रिश्ते को कूटनीतिक मोड़ नहीं दिया जा सकता

बीते सप्ताह भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश सचिव एस जयशंकर ने म्यांमार की यात्रा की. यह दौरा भारत के पक्ष में नहीं रहा. बर्मा ने दो टूक शब्दों में भविष्य में एनएससीएन (नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड) के खिलाफ़ किसी भी सैन्य अभियान में भारत का सहयोग देने से इनकार कर दिया है. क्या यह इसी महीने हुए भारतीय सैन्य अभियान पर सरकार द्वारा ढिंढोरा पीटने का परिणाम है? या इसके पीछे बर्मा सरकार की कुछ और मजबूरियां हैं? बर्मा सरकार का कहना है कि चरमपंथियों के खिलाफ अभियान से उनके देश के भीतरी इलाकों में घुस आने का डर है. क्या यह सच और वाजिब है?

चीन अभी से ही भावी लोकतांत्रिक म्यांमार में अपनी संभावनाएं तलाश रहा है. वह बर्मा से हिन्द महासागर में सीधे प्रवेश का रास्ता ढूंढ रहा है. चीन धीरे-धीरे भारत को पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण में श्रीलंका और पूर्व में म्यांमार की मदद से घेरने की कोशिश में सफल भी हो रहा है. ऐसे में हमें भी शीघ्र ही अपना रास्ता ढूंढ लेना चाहिए.   
नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

Tuesday, 26 May 2015

ई हs विज्ञापन के दुनिया, तू देख बबुआ

सुप्रीम कोर्ट ने जनता के पैसे से मीडिया में नेताओं के फोटो वाले विज्ञापन प्रसारित व प्रकाशित करने पर रोक लगा दी है. हालाँकि मोदी जी को इसकी छूट होगी. वह देश के प्रधानमंत्री हैं. प्रतियोगिता-परीक्षा के लिए सामान्य ज्ञान में वृद्धि हेतु जानना लाभप्रद रहेगा कि यह छूट राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी प्राप्त होगी.

कुछ मुख्यमंत्रियों को इस नियम से आपत्ति है. अरविंद इनमें नहीं हैं. उनके विज्ञापन एफ़एम पर आते हैं. रेडियो में तस्वीर की झंझट होती ही कहाँ है. विज्ञापन जितना लम्बा चाहो बजवा लो. वैसे, आजकल के चौबीस गुना सात एफएम चैनलों से केवल विज्ञापनों के ही तो कार्यक्रम आते हैं. हाँ, बीच-बीच में ब्रेक के तौर पर कुछ गाने बजा दिए जाते हैं. शेष समय मुर्गा-गधा-उल्लू इत्यादि बनाने में व्यतीत होता है. खैर, एफएम चैनलों पर असंतुष्ट नेताओं के लिए अपार संभावनाएं हैं.



अपने इलाके में एक पहुंचा हुआ रीमिक्सिया कलाकार है. पुराने गीतों में नए शब्द भरकर नित नव गीत रचते-गाते रहता है. लेकिन है वह समय के साथ चलने वाला. आज सुबह से ही तान छेड़ रखा है, “ई हs विज्ञापन के दुनिया, तू देख बबुआ.”

ऑटो- मेट्रो, अख़बार-टीवी, सिनेमा-खेल, कप-प्लेट, घर-दीवार, टी-शर्ट वगैरह... सर्वत्र विज्ञापन का ही राज है. जहाँ देखो वहीं विज्ञापन. थोड़ी सी स्पेस दिखी नहीं कि विज्ञापन ठूंस दिया. उसका सुझाव था, आप में योगेन्द्र- प्रशांत आदि के ब्रेक-अप से उत्पन्न रिक्त स्थान को भी विज्ञापनों से ही भर दिया जाए. संभव है, इससे पार्टी का अंतः कलह और क्लेश मिट जाए. विज्ञापन ‘नाशै रोग हरे सब पीरा’ है.

विज्ञापन के लिए ब्रेक चाहिए. ब्रेक का जीवन में बड़ा महत्व है. तथाकथित छोटे से ब्रेक के बाद ही तो बड़ी खबर आती है. बिना ब्रेक गिरने का डर रहता है, बाज़ार में गिरने का. ब्रेक के लिए ब्रेकर चाहिए, रोकड़ चाहिए. और इन सब के लिए कोई प्रायोजक चाहिए यानी स्पोंसर.

इस दौर में हर व्यक्ति, घटना, वस्तु, स्थान इत्यादि प्रायोजित हैं. सबका अपना-अपना स्पोंसर है. सब की स्पोंसरशिप होती है. पार्टी, नेता, जनता, वोटर सब स्पोंसर्ड हैं. स्पोंसरशिप ख़त्म, पार्टी चेंज. आम चुनाव एक लोकप्रिय विज्ञापन-प्रचार स्पर्धा है. जो विज्ञापन कला में निपुण होगा उसकी जीत होगी.

आज हर घटना प्रायोजित है. कॉलेज फंक्शन से लेकर विश्व भ्रमण तक के स्पोंसर हैं. हमारा आपका जीवन भी प्रायोजित है. जन्म, मृत्यु, विवाह इत्यादि सभी के प्रायोजक हैं. दहेज़ भी एक तरह की स्पोंसरशिप ही है. आज प्रेम भी स्पोंसर्ड परिघटना है. बिना प्रायोजक प्रेम असंभव है. प्रेम के लिए बज़ट चाहिए. पैसा खत्म, प्यार ख़त्म. जेब खाली कि बाय-बाय. यहाँ प्रेम की पराजय है. नगद नारायण की जय है.

एक तरफ दहेज़, हत्या, आतंकवाद, दंगा तो दूसरी ओर पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार सब प्रायोजित हैं. सब सौदा है. सबके स्पोंसर हैं. बीते दिनों नीतीश की सभा में दस-बारह साल के लड़के का प्रतिभाशाली भाषण हुआ. लोग शक कर रहे हैं, कहीं वह भी स्पोंसर्ड तो नहीं? क्या करियेगा, कुछ तो लोग करेंगे, लोगों का काम है शक करना- गायक गा रहा है.

और खेल? खेल तो पूर्णतः विज्ञापन का ही एक उपक्रम है. मसलन क्रिकेट की प्रत्येक गेंद, रन, ओवर, विकेट, टीम इत्यादि के स्पोंसर होते हैं. अब तो हार-जीत भी स्पोंसर्ड आने लगी है.

विद्वत जनों के अनुसार विज्ञापन ने मीडिया को खोखला कर दिया है. रेडियो, टीवी और अख़बार के बाद अब सोशल मीडिया भी इसकी गिरफ़्त में है. यहाँ अभी तक तो सब अपना ही विज्ञापन करने में व्यस्त हैं. लेकिन वह रात दूर नहीं जब अधिक फैन फोलोविंग वाले लोग अपनी-अपनी वाल पर मल्टी-नेशनल कंपनियों के विज्ञापन का पोस्ट डालना शुरू कर दें. कवि-कलाकार आदि अपने शो की टिकट बिक्री हेतु इस युक्ति का सदुपयोग कर ही रहे हैं. वहीं फेसबुक पोस्ट के मध्य में ब्रेक डालने पर विचार-मंथन जारी है. इन ब्रेक को विज्ञापन से भरा जा सकता है. परंपरानुसार किसी राजनेता से ही इस परियोजना के उद्घाटन की प्रतीक्षा है.


विज्ञापन एक कला है. फेंकने की कला. समेटने की कला. इसमें जीत है, पैसा है. इसमें सभी अलंकार हैं, रस हैं. छंद, लय, तुक, गति-यति, सौन्दर्य सब है. इसमें साहित्य है. समाज है. किन्तु विज्ञापन है तो मेकअप ही. बिना छपे- बिना दिखे मेकअप का क्या फ़ायदा? रीमिक्सिया बाबू गा रहा है- ई हs विज्ञापन के दुनिया तू देख बबुआ... एकाएक लय-सुर पलटता है और वह संजीदगी से गाता आगे निकल जाता है- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...  

नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं। 

Wednesday, 20 May 2015

अक्ल बड़ी या भैंस

सर्दी का महीना था और शाम का समय. दादा जी चादर ओढ़े आग के पास कुर्सी पर बैठे थे. आकाशवाणी से समाचार ख़त्म होते ही चारों तरफ से बच्चों की मंडली आ धमकी. सोनू, मोनू, मिठ्ठू, लालबाबू, टिंकू, रिंकी और अंजलि. सभी ने उन्हें घेर लिया और रोज की तरह कहानी सुनाने की जिद करने लगे.

आज भी पहले उन्होंने सबसे दिन भर की पढ़ाई-लिखाई का हाल पूछा और फिर कुछ देर तक चुप रहने के बाद कहानी सुनाने लगे. “सुनो बच्चों, आज मैं तुम्हें एक बहुत पुरानी कहानी सुनाता हूँ- बहुत पहले की बात है. मगध प्रान्त में पटसा नाम का एक गाँव हुआ करता था. गांव के बीचोबीच एक बड़ा कुआँ था. समय के साथ अब वह गांव का अकेला ऐसा कुआँ था जिसका पानी साफ़ और उपयोगी रह गया था. इसलिए उसी कुएँ के पानी से पूरे गाँव का खाना-पानी, नहाना-धोना सब चलता था. दिनभर वहां पानी भरनेवालों की भीड़ लगी रहती थी. लेकिन उस कुएँ का अहाता बहुत कम ऊँचा था इसलिए लोगों को गिरने का डर भी लगा रहता था.

“फिर क्या हुआ दादा जी”, अंजलि को बीच-बीच में यह प्रश्न दोहराते रहने की आदत थी. कहानी शुरू नहीं होती कि वह अंत जानने को आतुर हो उठती थी. बाकी बच्चे चुपचाप सुन रहे थे.

“फिर एक अमावस की अँधेरी रात जब पूरा गाँव गहरी नींद सो रहा था एक बूढ़ा भैंसा उस कुएँ में जा गिरा.”

“क्यों वह अंधा था ?” मिट्ठू हँसते हुए बोला. बाकी बच्चे भी खिलखिला कर हंस पड़े. लेकिन अंजलि उदास होकर बोली- “फिर क्या हुआ ?”

“हाँ वह अंधा था” दादाजी ने कहानी आगे बढ़ाई- “फिर सुबह होते ही जैसे ही लोग पानी भरने आये कुएँ में भैंसा को देख उनमें खलबली मच गयी. यह बात समूचे गांव में आग की तरह फैल गयी. सभी को यह चिंता सताने लगी कि अब वे पानी कहाँ से लायेंगे. हाँ, इससे पहले कि तुम लोग गंभीर चिंतन करने लगो, मैं बता दूँ कि उस समय चापाकल का आविष्कार नहीं हुआ था और पानी का प्रमुख स्रोत तालाब या कुआं ही होता था.”

“गाँव के लगभग सभी बड़े बूढ़े कुएँ के पास आ जमा हुए और भैंसा को बाहर निकालने की तरकीब ढूंढ़ने लगे. बड़ी और मोटी रस्सियाँ, मजबूत बांस के खंभे और विशाल लकड़ी के लट्ठे इकट्ठे किए गए. दूर दूर से नामी-गिरामी पहलवान बुलाये गए. सभी ने मिलकर भैंसा को रस्सी से बाँधकर बाहर निकालने की भरसक कोशिश की लेकिन उनकी एक न चली. सारे यत्न विफल हो गए.”

लालबाबू से नहीं रहा गया. वह हँसते हुए बोला, “भला उसे किसी मोटे भैंसा से ही क्यों नहीं खिंचवा दिया गया.” “नहीं-नहीं” अंजलि बोली, “उसे हाथी से खिंचवाना चाहिए था.” उसके भोलेपन पर बाकी बच्चे हंस पड़े. तभी मिट्ठू गंभीर होते हुए बोला, “तो आगे क्या हुआ दादा जी !”

“हाँ, लेकिन उस समय लोग तुम्हारी तरह होशियार नहीं थे.” दादा जी मुस्कराते हुए बोले और फिर शुरू हो गए- “सभी पहलवानों के छक्के छूट गए लेकिन भैंसा अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला. बेचारा बहुत कष्ट में था. उसका गर्दन मुड़ा हुआ था, पीठ में छाले पर गए थे और उसके अगले पैर जस के तस टेढ़े पड़े थे जिसे वह चाह कर भी सीधा नहीं कर पा रहा था. गर्मी के दिन थे. दोपहर का समय हो रहा था. पहलवानों के पसीने छूटने लगे और वे थक हार कर पास के बरगद के विशाल पेड़ की छाँव में लेट गए.”

“तभी हँसते खेलते बच्चों का एक झुंड वहां से गुजरा. वे भी कुएँ में झांक रही भीड़ देख उधर की ओर बढ़े. अन्दर भैंसा को देख सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे. कुछ बच्चे भैंसे से बंधी रस्सी और बांस पर अपनी ताकत आज़माते हुए चिल्लाये- जोर लगा कर... हईसा ! जोर लगा कर... हईसा !”

हाहाहा... अंजलि और उसके दोस्त हंसने लगे. मिट्ठू बोला- जब उतने सारे पहलवान नहीं निकाल पाए तो ये बच्चे तो... हहहाहा....

अंजलि गंभीर होती हुई बोली, “हमारी ही तरह भोले होंगे.”

“इस बीच कुछ पहलवान फिर से जोर आज़माइश करने आ पहुंचे. उन्होंने बच्चों को डाँटते हुए भगा दिया.” दादा जी फिर शुरू हो गए- “अपनी मंडली का यह अपमान देख मंडली के सरदार रामलाल से नहीं रहा गया. उसने नेता की तरह ऐलान करते हुए कहा- यह काम तो हम चुटकी बजाते कर लेंगे. उसकी यह बात सुन पहलवानों ने जोर के ठहाके लगाये. रामलाल ने अपनी मंडली के सभी साथियों को बुला कर कुछ मंत्रणा की और फिर दो-दो के खेमों में बंटकर गाँव के अलग-अलग मुहल्लों की ओर निकल पड़े. जब वे लौटे तो प्रत्येक दल में दस-बारह बच्चे थे. वे अपने साथ एक-एक घड़ा भी ले आये थे.” 

“फिर क्या हुआ दादा जी”- अंजलि बोली.

“वे घला लेकल किया कलते ?”- छोटी रिंकी तुतलाती हुई बोली.

“बताता हूँ बाबा... बताता हूँ”, दादाजी ने कहानी आगे बढ़ाई- “गाँव के पास से ही एक नदी बहती थी. रामलाल ने अपने सभी साथियों को बीस बीस गज के फ़ासले पर नदी से लेकर कुआँ तक एक कतार में खड़ा कर दिया. और वह खुद सभी घड़े लेकर नदी किनारे पहुँच गया. वह नदी से पानी भरकर घड़ा दूसरे को बढ़ा देता, दूसरा तीसरे को, तीसरा चौथे को...और यही क्रम कतार के अंत में कुआँ के पास खड़े चंदन तक चलता रहता जो घड़ा का पानी कुआँ में उलटते जा रहा था. हर कोई अपना भरा घड़ा अगले को थमा देता और खली घड़ा पिछले को. इस तरह अगले कुछ घंटों में पानी से भरे सैकड़ों घड़े कुआँ में पलटे चुके थे. कुआँ का पानी धीरे धीरे ऊपर उठने लगा. पानी के साथ भैंसा भी ऊपर आने लगा. रामलाल और उसकी मंडली की इस करामात को देख गांववाले हैरान थे. शाम ढलते ढलते कुआं का पानी काफ़ी ऊपर तक आ गया था. तब सारे पहलवानों ने एक बार और जोर लगाया... जोर लगा कर... हईसा ! और देखते ही देखते भैंसा कुआँ के बाहर था.”

“गांववालों ने मिलकर झट से कुआं और उसके आसपास की सफ़ाई भी कर दी. अब कुआँ फिर से चालू हो गया. गाँव वाले बहुत खुश थे और रामलाल तथा उसकी मंडली की जमकर प्रशंसा कर रहे थे.”  

“दादा जी !” अंजलि गंभीरता पूर्वक बोली, “आज की कहानी से भी कोई शिक्षा मिलती है न ?

“हाँ बच्चों ! आज की कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है.”


“हम भी होते तो यही कलते” रिंकी खुशी में उछलते हुए नानी की तरफ भागी जो अभी-अभी सबके लिए मिठाई लिए आ रही थी. बाकी बच्चे भी शोर मचाते हुए उसके पीछे भाग चले. 

नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं। 



Saturday, 16 May 2015

मुक्ति



आत्मा और परमात्मा का एकीकरण ही मुक्ति है. मुक्ति दो प्रकार से संभव है. या आत्मा परमात्मा में लीन हो जाए या आत्मा में परमात्मा ही समाहित हो जाए. पहली प्रक्रिया ‘प्रेम’ है. प्रेम से ममत्व भाव और अधिकार बोध उत्पन्न होता है. आत्मा का अहं विराट रूप ग्रहण कर अपने ममत्व में परमात्मा को समेट लेती है. दूसरी भक्ति है. भक्ति में आत्मा स्वयं के अहं का क्षय कर परमात्मा में विलीन हो जाती है. प्रेम में विशालता है, उदारता है. भक्ति में समर्पण और त्याग है. सेवा दोनों का ही मूल भाव है. एकाकार होने तक की प्रक्रिया जीवन है. प्रेम और भक्ति ‘सत्य’ रुपी मार्ग के दो पगडंडी हैं.

‘विकार’ मुक्ति-प्रक्रिया में विघ्न डालता है. वह सत्य के मार्ग से भटका देता है. सत्य का मार्ग मुक्ति का सबसे लघु मार्ग है. भटकने से विलंब की विशालता बढ़ती है. मनुष्य मुक्ति के लक्ष्य से निरंतर दूर होता जाता है. किन्तु विकार है क्या? घृणा, असहिष्णुता, स्वार्थ, वासना, लोभ, हिंसा, क्रोध इत्यादि विकार के अनेक रूप हैं. विकारों का कार्य-परिणाम ‘पाप’ है तो विकार मुक्त कर्मों का परिणाम ‘पुण्य’. पुण्य हेतु किया गया कार्य ‘धर्म’ और पाप फलदायी कर्म ‘अधर्म’ है.  


विकार मनुष्य को असत्य के मार्ग पर ले जाता है. असत्य के असंख्य मार्ग हो सकते हैं. सत्य का केवल एक ही मार्ग संभव है. किसी सत्य का वैकल्पिक प्रकटीकरण असंभव है. विकारों के संसर्ग से मनुष्य में दुर्बलता उत्पन्न होती है. किन्तु दुर्बलता की पकड़ दुर्बल नहीं होती है. जो एक बार इस डोर से बंध जाए लाख यत्न कर नहीं निकल पाता. ‘योग’ इन विकारों से मुक्ति की युक्ति है. और सबल, जो विकारों से मुक्त मनुष्य है वही सबल है. और सबल को ही मुक्ति अर्थात अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है.  


नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

Sunday, 12 April 2015

एक अपील: जल बचाएं... जीवन बचाएं

वर्षों पहले कवि रहीम कह गए- रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून/ पानी गये न ऊबरे मोती मानुष चून’. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर वैश्विक स्तर पर नीतिगत बदलाव नहीं किए गये, तो 2030 में दुनिया की जरूरत का सिर्फ 60 फीसदी पानी उपलब्ध होगा. विश्व जल संकट को देखते हुए भारत सरकार राष्ट्रीय जल नीति बनाने को लेकर गंभीर हुई है. इसी के तहत एक संसदीय समिति देश भ्रमण कर जल संसाधनों का अध्ययन कर रही है. इससे पूर्व पिछली सरकार ने साल 2013 को जल संरक्षण वर्ष घोषित किया था. वहीं,  वैश्विक स्तर पर जल संसाधन के बढ़ते हुए अनियमित दोहन एवं प्रदूषण, घटती मात्रा एवं गुणवत्ता और बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग एवं सुखाड़ की आशंका के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 22 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस के रुप में मनाया जाता है. लेकिन कुछ वैश्विक सम्मेलनों एवं समझौतों के अतिरिक्त कोई अन्य क्रांतिकारी परिणाम सामने नहीं आया है.

ज्ञात ब्रह्मांड में पृथ्वी ही जीवन से संपन्न एक मात्र ग्रह है क्योंकि यहाँ जल है. धरती के कुल पानी का केवल 2.7% ही मानव उपयोगी है, उसका भी दो तिहाई हिस्सा हिमानी और ध्रुवीय बर्फ के रुप में जमा है. विश्व में स्वच्छ पानी की मात्रा लगातार गिर रही हैं, और जैसे जैसे विश्व जनसंख्या में अभूतपूर्व दर से वृद्धि हो रही हैं, निकट भविष्य में इस असंतुलन का अनुभव बढ़ने की उम्मीद है. किसी ने कहा है यदि समय पर जल का दुरुपयोग रोका न गया तो अगला विश्व युद्ध पानी के लिए ही लड़ा जायेगा.



प्राचीन यूनान के आयोनियन शहर के निवासी, उस समय के दार्शनिक एवं वैज्ञानिक मिलेटस के थेलीज़ (636-546 ई.पू.) ने कहा था- “यह पानी ही है, जो विचित्र रूपों में धरती, आकाश, नदियों, पर्वत, देवता और मनुष्य, पशु और पक्षी, घास-पात, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से लेकर कीड़े-मकोड़ों तक में मौजूद है. इसलिए पानी पर चिंतन करो.” लेकिन हम सिर्फ इसका दोहन करते रहे. और यह भूल गये कि हमने ये संसाधन अपने पूर्वजों से विरासत की बजाय अपनी भावी पीढ़ियों से ऋण में लिए हैं. नतीजतन, आज पारिस्थीतिकीय जलचक्र का संतुलन बिगड़ चुका है. ऐसा अनुमान है कि 2030 तक विश्व की आधी आबादी जलसंकट से दो चार हो रही होगी जिसमें समूचा भारत भी शामिल होगा. 

गौरतलब है कि भारत में विश्व का मात्र 4% जल है जबकि संसार की 18% आबादी यहाँ बसती है.  देश की कई नदियाँ अब सदानीरा नहीं रही, गंगा जैसी विशाल और धारावाही नदियों का पानी प्रदूषित हो चुका है. उत्तरी मैदानी इलाके में भी मई के अंत तक आते-आते ताल तलैये सूख जाते हैं और चापाकल पानी छोड़ देते हैं. स्वच्छ पेयजल अब नदारद है. विषैला पानी नाना प्रकार के नए-नए रोग उत्पन्न कर रहा है. भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था आज भी कृषिप्रधान है, में मानसून भी अनियमित हो चला है. फसलों के सुखाड़ से त्रस्त किसान आत्महत्या के लिए विवश हैं.

परिणाम अभी भी उतने भयावह नहीं हैं जितने कि अगले कुछ वर्षों में दिखने वाले हैं. इसलिए सरकार को इस दिशा में सतर्क होने की जरूरत है. उसे कुछ ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाएँ व नीतियां शुरू करनी होंगी जिससे जल संरक्षण को बढ़ावा मिले. यथा शहरीकरण एवं औद्योगीकरण से होने वाले जल प्रदूषण पर नियंत्रण पाना, नदियों का संरक्षण, वनों की कटाई पर रोक लगाकर वृक्षारोपण को बढ़ावा देना, गंदे पानी के शोधन तथा समुद्री जल के उपयोग हेतु वैज्ञानिक शोध और तकनीक को प्रोत्साहन देना, जल की अनुचित बर्बादी रोकने हेतु जन जागरुकता फैलाना आदि.
हाँ, अकेले सरकार चाहकर भी इस दिशा में बहुत कुछ नहीं कर सकती है. इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी.

अंत में, मानवता और राष्ट्र के हित में देश के सभी नागरिकों, युवाओं, बुद्धिजीवियों और विशेष रूप से शिक्षकों व छात्रों से निवेदन है कि वे भी एक एक बूँद जल बचाने का संकल्प लें और समाज में जल के संरक्षण और सदुपयोग पर जन जागरूकता फैलाएँ. आप सब जीवन में कम से कम पाँच पेड़ जरूर लगायें. याद रहे, जल है तो जीवन है.

नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।


Tuesday, 7 April 2015

तराना-ए-विदाई : जामिया मिल्लिया इस्लामिया

जामिया स्कूल Jamia Schools
लिखने को आज ग़ज़ल ये
मेरे हाथ थरथराए 
कहने की बारी अलविदा 
आँखों में आंसू आये 

हम क़ाफ़िला थे अब तक 
क़तरा क़तरा थे समुन्दर 
अब टूट कर बिखर कर 
कल किस तरफ़ को जाएँ  

उस्तादों के हैं एहसान जो 
हम ना चुका सकेंगे 
ग़लती भी हो हमारी तो 
देते हैं ये दुआएंं 

है जामिया का आँगन 
मेरी माँ की गोद जैसा 
बचपन के दिन गुज़ारे 
और दोस्त भी बनाए 

रौशन शमा जो इल्म की 
इस जामिया से मिली 
इसको जलाये रखना 
ईमान-ए-हक़ बनाए 

है जामिया की अज़मत 
कंधों पे अब तुम्हारे 
आगे बढ़ोगे अब तुम 
रखना इसे बनाए 

मायूस कितना दिल है 
कि हम दूर हो रहें हैं 
ताउम्र हम रखेंगे 
यूँ दिल से दिल मिलाये 

बहुत खामोश रहता है 
मगर नादाँ नही है "ज़ैद" 
उसे आवाज़ बनना है 
जिसे सदियों सुना जाए 

अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.

Saturday, 28 March 2015

स्वर्णिम बिहार

मौर्य-मगध का केंद्र-बिंदु हो,
क्रांति की अंगड़ाई हो। 

वर्तमान को दिया दिखाते,
स्वर्णिम भूत की परछाई हो।


भोज-अंग-मिथिला का स्वर हो,
वज्जी-मगही का तराना हो

'पञ्चबजना' की स्वरलहरी पर,
विद्यापति का गाना हो


जाट-जटिन का प्रेमनृत्य हो,
'कोहबर' की फूलकारी हो। 

'अरिपन' की तुम उज्जवल रचना,
'मधुबनी' की चित्रकारी हो


सारण के तुम रास-रंग हो,
चम्पारण की बुद्धि हो। 

शाहाबाद की तुम हो वीरता,
दरभंगा की विद्या हो


गंगा के तुम पावन जल हो,
कोसी-कमला के जाये हो। 

नारायणी की गोद में बैठे,
सुन्दर रूप बनाए हो


उदयिन-अशोक हैं पुत्र तुम्हारे,
सीता भी तो जाई है। 

गाँधी-बुद्ध आगंतुक तेरे,
महावीर के भाई हो


जी करता है जन्म-जन्म मैं,
गोद तुम्हारे हीं खेलूँ। 

भारतवर्ष का बेटा बनकर,
नाम "बिहारी" कहलाऊं । 


(फोटो क्रेडिट: बिहार ऑनलाइन)

अंकित कुंदन दुबे छात्र, स्वतंत्र टिप्पणीकार तथा जीवन मैग के टीम मेंबर हैं। आप पूर्वी चंपारण, बिहार से आते हैं और फेसबुक पर "आपन टिकुलिया" नामक ऑनलाइन ग्रामीण समुदाय के संचालक हैं। वर्तमान में पढाई के सिलसिले में नयी दिल्ली में प्रवास है।

Tuesday, 24 March 2015

रेडियो सीलोन की यादें

एक ज़माना था जब  रेडियो सीलोन की स्वर लहरियों के साथ करोड़ों हिन्दुस्तानियों का दिल धड़कता था. क्या शहर और क्या गाँव, हर सड़क गली मोहल्ला और दुकानों से एक ही रेडियो चैनल बजता था. एक से बढ़कर एक सदाबहार गाने बजते जाते थे और लोग अपने-अपने काम में रमे रहते थे. पचास के दशक की शुरुआत में आकाशवाणी से फ़िल्मी गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी गयी थी. उसी समय रेडियो सीलोन ने हिंदी फ़िल्मी गानों का प्रसारण शुरू कर दिया. यह गीत संगीत के लिहाज़ से हिंदी सिनेमा का सुनहरा दौर था. रेडियो सीलोन दिन दूनी रात चौगुनी की रफ़्तार से भारतीय जनमानस में लोकप्रिय होता चला गया.

मशहूर रेडियो प्रसारक अमीन सायानी, पंडित गोपाल शर्मा, शिव कुमार सरोज, मनोहर महाजन, रिपुसूदन ऐलावादी, विजयलक्ष्मी आदि ने रेडियो सीलोन से जुड़े रहकर घर घर में लोकप्रियता हासिल की. इनकी हस्ती तबके किसी फिल्मी कलाकार से कम नहीं थी. बहुत कम लोगों को मालूम है कि अभिनेता बनने से पहले सुनील दत्त भी रेडियो सीलोन में उद्घोषक थे. उन दिनों श्रोताओं में अमीन सायानी के काउंट डाउन की शक्ल वाले बिनाका गीतमाला प्रोग्राम की वही लोकप्रियता थी जो बाद में रामायण और महाभारत जैसे टीवी सीरियलों को ही नसीब हुई.

उस ज़माने में वक्त का पैमाना भी रेडियो सीलोन ही था. तब सुबह आठ बजे के आसपास प्रतिदिन ‘पुराने फिल्मों का संगीत’ कार्यक्रम के अंत में के.एल. सहगल का गाना बजता था. जैसे ही सहगल का गाना शुरू होता मतलब घड़ी आठ बजाने वाली होती, माँ अपने बच्चों को स्कूल के लिए फटाफट रवाना कर देती थीं. उन दिनों एक लतीफ़ा भी बेहद मशहूर हुआ था कि देहात के लोग जब रेडियो खरीदने जाते तो दुकानदार से फिलिप्स या मर्फी की बजाय रेडियो सीलोन की मांग करते थे. कहने का तात्पर्य कि रेडियो सीलोन भारतीय लोक संस्कृति में पूरी तरह रच बस चुका थी.

गुज़रते वक्त के साथ, सत्तर के दशक के अंत में श्रीलंका गृह युद्ध के चपेट में आ गया. सिंहल और तमिल आपस में लड़ भिड़े. सरकार से हिंदी सर्विस को मिल रहा सहयोग निरंतर घटता चला गया. सभी मशहूर प्रसारक श्रीलंका छोड़ हिंदुस्तान लौट आये. अंग्रेज़ों का छोड़ा पुराना ट्रांसमीटर कमजोर पड़ने लगा. भारत सरकार ने देशी कंपनियों द्वारा विदेशी प्रसारकों के हाथ विज्ञापन बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया. आहिस्ता-आहिस्ता रेडियो सीलोन की प्रसारण अवधि घटती चली गयी. और इसके दीवाने विविध भारती और नए एफएम चैनलों की तरफ शिफ्ट हो गए. जो लोग बचे उनमें अब रेडियो सीलोन के प्रति श्रद्धा पूर्ण आभार की भावना और उन सुनहरे दिनों की चंपई स्मृतियां ही शेष हैं.


फ़िल्मी गानों पर आधारित विभिन्न कार्यक्रम प्रारूप, म्यूजिक काउंट डाउन, श्रोताओं से पत्र और एसएमएस व्यवहार, कलाकारों और श्रोताओं के जन्मदिन पर विशेष संदेश एवं कार्यक्रमों के प्रसारण आदि परंपराओं की जननी रेडियो सीलोन ही है. आज भी दुनिया भर के चैनल इनका अनुकरण कर रहे हैं. रेडियो सीलोन ने प्रसारक-श्रोता संबंध की नई संस्कृति को जन्म दिया. देश भर में लाखों रेडियो क्लब स्थापित हुए. वहीं दक्षिण एशिया में हिंदी के प्रचार प्रसार में रेडियो सीलोन की भूमिका अविस्मरणीय रही है.

आज श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन की हिंदी सर्विस सुबह में मुश्किल से दो-ढाई घंटे प्रसारण करती है. वह भी रेडियो पर अब साफ़-साफ़ सुनाई नहीं देता है. अब न प्रसारकों में वह उत्साह ही रहा और न श्रोताओं में रेडियो के प्रति वह दीवानगी. जब मैं आखिरी बार रेडियो सीलोन सुन रहा था तो घनी सरसराहट और सिसकारियों को भेदती हल्की किन्तु उतरती-चढ़ती तेज़ स्वर लहरी में जो गीत आ रहा था वह कुछ-कुछ उसकी और बहुत कुछ हमारी दास्ताँ ही सुना रहा था... तुम ना जाने किस जहां में खो गए, हम भरी दुनिया में तन्हा हो गए...
 

नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan

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