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Sunday, December 14, 2014

Mission Aman Promotional Video

 

Students from India & Pakistan come together on Skype to chat on little sweet things like culture, lifestyle, food, movies & sports...!!!
http://missionaman.jeevanmag.com/
Mission Aman is aimed to break the ice between the people of the "two nations: one soul"!
It's a part of GNML Online, a joint social media initiative of PH International & US Department of State and sponsored by India's first online bilingual magazine by students www.jeevanmag.com
If you want to participate in the program, feel free to drop us a message!

http://missionaman.jeevanmag.com

आख़िर किस ओर युवा भारत?

लोकतंत्र के 65 वर्षो में हमारा भारत कितना परिपक्व हुआ है यह हमें यदा कदा पता चलता रहता हैं जब अख़बार के एक ही पन्ने के चौथाई भाग में मुज़फ्फरनगर के दंगे और भारत का मंगल मिशन साथ प्रकाशित होता है। उसी भारत भूमि का जिसकी सभ्यता 5000 हज़ार साल पुरानी हैं, एक युवा मंगलयान के लिए विशिष्ट उपलब्धि हासिल करता हैं और एक युवा भारतीय दंड संहिता की धारा 148 के तहत जेल में बंद होता है। क्या इस खाई का निर्माण हम युवाओं ने किया है?  
एक ऐसा वर्ग जिसकी ज़रूरत रोटी और रोजगार है वो सड़कों पर धर्म के नाम का हथियार लेकर चलती हैं।
एक ऐसा वर्ग जिसके सदस्य जहाँ राष्ट्रीय भावना में पाक-चीन की सरहदों पर देश की रक्षा करते हैं, उसी वर्ग के दूसरे सदस्य क्षेत्रीय संस्कृति, क्षेत्रीय भाषा, के नाम पर क्षेत्रीय पार्टियों के उकसावे पर राष्ट्र हित तक त्याग कर देते हैं।
आज वर्षों बाद भारत दुनिया का सबसे युवा देश हैं और बहुत खुशी की बात हैं की एक युवा देश, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, और उस लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर, आज विकास-रोजगार और देशहित में नहीं बल्कि आत्सम्मान, गोडसे , मंदिर, मस्जिद, धर्मपरिवर्तन, माफ़ी , गीता, हिंदू , गर्व हैं की मुसलमान हूँ,गर्व हैं RSS से हूँ इत्यादि इत्यादि राष्ट्र विनाशक तत्वों की बात करता है। हमें समय रहते चेतना होगा ताकि इस सबका परिणाम हमारा यह युवा राष्ट्र न भुगते।
जाने किस उदयमान युवा भारत की चर्चा एक सफ़ेद ढाढी, हाफ़  बंडी- कुर्ते पहनने वाला व्यक्ति विश्व के मंच पर करता है? 


(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)

Saturday, December 13, 2014

मीडिया ट्रायल- संतोष


लोकतंत्र का चौथा स्तंभ 'संवादपालिका' आज खुद कटघरे में खड़ा है| और आरोप है कि इसने 'संवाद' जो कि इसके अस्तित्व की बुनियाद है, से छेड़खानी की है| निरंतर और चौतरफा लगे आरोपों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है | और लोकतंत्र के लिए इससे बुरा क्या हो सकता है कि मीडिया संदेह के घेरे में हो | यह और भी खतरनाक तब लगता है जब हम इसकी तह तक जाते हैं | मनोविज्ञान के अनुसार कंडीशनिंग का असर मनुष्य पर जीवनपर्यन्त रहता है | बाल्यावस्था से ही हम सूचनाओं से घिरे होते हैं | सूचना से विचार आते हैं, विचार से नजरिया बनता है, नजरिया से अवधारणा बनती है और अवधारणा से व्यक्तित्व का विकास होता है | तो यह साफ दिखता है की एक व्यक्तित्व के विकास में सूचना का कितना महत्त्व है | उदहारणस्वरुप आपने अपने होने वाले पति/पत्नी को नहीं देखा है, विभिन्न सूत्रों से आपको पता लगता है की वो दिखने में बहुत ही सुन्दर हैं,उनकी नाक लम्बी है, रंग गोरा है और वो अच्छा नाचते व गाते भी हैं | तो मन ही मन हम उस व्यक्ति की एक इमेज बना लेते हैं कि वो ऐसे दिखते होंगे | और अगर सूचना ही गलत हो तो ..... ?

शरीर की व्याधि का उपचार तो संभव है, किन्तु इस सूचना तंत्र के बीमार होने से जो मानसिक महामारी फैल रही है यह अनुपचारित है | यह देश के युवाओं को, और विशेषत: उन युवाओं को जो मीडिया में करियर बनाना चाहते हैं उन्हें, गुमराह करती है | छात्र जीवन में हर मीडिया पर्सन को 'एथिक्स ऑफ़ मीडिया' पढाया जाता है फिर क्यों नहीं वो उसका अनुसरण करते हैं? क्यों हमारे यहाँ  'तरुण तेजपाल' जैसे पत्रकार पैदा होते हैं ? क्यों हम पर 'पेड मीडिया' का टैग लगाया जाता है? क्यों हम पर 'बायस्ड' होने का आरोप लगाया जाता है? जब इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढते हैं तो हमारे नैतिक मूल्य और शिक्षा व्यवस्था ही प्रश्नों के घेरे में आ जाती है |
एक पत्रकार को शुरू से ही यह घुट्टी पिलायी जाती है कि विचारशून्य बनो | स्मरण रहे की एक विचारशून्य व्यक्ति कभी दूसरों के विचारों की कद्र नहीं कर सकता | सच, सच ही होता है तथा झूठ, झूठ ही | अगर एक पत्रकार सच को सच बता दे तो अपने कर्तव्य का निर्वाह न करने का आरोप कहाँ तक जायज है ? और इस कर्तव्य का निर्धारण आखिर करता कौन हैं ? क्या वही किताबें और कानून जो आज से 40-50 साल पहले लिखी गई थी | उस समय के हिंदुस्तान और आज के इंडिया में बहुत बदलाव आ गया है | आज हमारा एक घोटाला तो कई देशों के बजट से भी अधिक होता है | आज देश की सीमा से अधिक तनाव तो देश के शहरों में होती है | आज जंग से अधिक कुर्बानियां तो दंगो में दी जाती है | आज चोर-डाकुओं से अधिक खौफ तो पुलिसवालों का होता है | आज संसद से अधिक शालीनता तो सड़क पे दिखती है | फिर हम कैसे आशा कर सकते हैं कि बदलाव की इस बयार से मीडिया अछूता रह जायेगा ? निसंदेह आर्थिक पहलुओं ने मीडिया के 'एथिक्स' को प्रभावित किया है परंतु इसकी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता | आज इक्कीसवीं सदी के भारत में कोई भी संस्थान, समाज या व्यक्ति विचारशून्य नहीं हो सकता, और अगर है तो कम से कम पत्रकार न बने |
अब वक्त आ गया है उस अध्याय को पाठ्यक्रम से हटा देने का जिसकी उपयोगिता बदलते समय में क्षीण हो गई है | अब वक्त आ गया है नई नीतियों के निर्धारण का | अब वक्त आ गया है आत्मचिंतन का | अब वक्त आ गया है खुल कर बहस करने का | हर नीति, कानून, और बहस के अंत में व्यक्ति ही होता है इसीलिए यह सर्वाधिक आवश्यक है कि वह अपने विवेक का इस्तेमाल करे | एक पत्रकार को सच कहने और पूछने का साहस होना चाहिए | सूचना क्रांति के इस दौर में कुछ भी छुपा नहीं है तो फिर इस "पारदर्शी नकाब" की क्या जरुरत है ?
'लोकतंत्र के प्रहरी' को भी अपने नैतिक मूल्यों को समझना होगा, तथा 'ब्रेकिंग न्यूज', 'फ्रंट पेज' और 'लुटियन जोन' की पत्रकारिता से बचना होगा अन्यथा दिन - प्रतिदिन अपनी विश्वसनीयता खोता जायेगा | उसे वंचितों की आवाज बुलंद करनी होगी, उसे भ्रष्टाचारियों को आईना दिखाना होगा और उसे बदलते भारत का गवाह बनना ही होगा |

संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Tuesday, December 09, 2014

शॉर्ट टर्म सीएम के लॉन्ग टर्म बोल! (व्यंग्य)


आजकल बिहार के मुख्यमंत्री को अपने काम से ज़्यादा बयान पर ध्यान देना होता है,काम पर क्यों ध्यान दे ये तो चलता रहेगा पर उनकी गाड़ी का क्या अब खिसकने में कुछ ही दिन जो रह गये हैं। वैसे भी सुशासन बाबु जो काम पर ध्यान लगाए हुए हैं ही,लालू जी भी तो उनका सहयोग दे ही रहे हैं। सीएम जीतन जी के घर में आपको राम जी के जगह नीतीश जी की फोटो मिलेगी क्योंकि जीतन जी के लिए ये पुरुष ही नही महापुरूष हैं! भला,इस घोर कलयुग में जहां अपने बस की कुर्सी नही छोड़ते, इन्होने सीएम की कुर्सी छोड़ दी ! (बात को दबा के रखिये; नमोफोबिया वाले हैं हमसब )
बेचारे नीतीश जी के दाव उल्टे पड़ गये रिमोट कंट्रोल वाली सरकार बनाने चले थे,पर ये तो "आउट ऑफ़ कवरेज एरिया" हो गया! राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में विकास कार्य पिछले 2 साल से ठप पड़े हैं। इन सबके ज़िम्मेदार नीतीश कुमार हैं।
लोकसभा में मजदूरी मांग रहे थे जो खुद दुसरे (राज्य कर्मचारी) को देने से इतराते रहे, सड़क पर लठवाते रहे....जनता सब याद रखती है।
*मिला ना बाबा जी का ठुल्लू*
मिला तो गिरिराज को जो चुनाव में गधे की तरह रेंकते रहे,अब सुस्ताने के लिए डेल्ही में हैं।
** मांझी के तराने....
जीतन ने मंदिर से पकड़े चूहे को नीतीश का विदेशी भक्त बताते हुए अपने प्रधानमंत्री बनने से पहले 5000रु देकर बीजेपी के साथ इसकी अस्थि गंगा में बहाने का सपना देख रहे है।


"कड़वा" भी इसलिऐ लगता हूँ लोगों को!
क्योंकि सच बोलता हूँ!
आप कहो तो "मीठा" हो जाऊँ.
फिर ये न कहना...
"बहुत झूठ बोलते हो यार.."

आलोक कुमार वर्मा
कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज
दिल्ली विश्वविद्यालय


****लेख के विषय-वस्तु से संपादन मंडली का राज़ी होना ज़रूरी नहीं है.***

Friday, December 05, 2014

विनम्रता (कविता)- नन्दलाल


विनीति नीति प्रीति की अजेय सनातन रीत है,
सुर असुर के फ़र्क में विनम्रता ही विपरीत है.

विनम्रता नहीं धूर्तता न इसमें अहं का दंश है,
यह आग्रह सत्य का परमात्मा का अंश है.

हित शत्रुओं के विनय ही खड्ग और ढाल है,
समुज्ज्वलित इसी में गांधी की मशाल है.

संग ढलते वय के अडिग दंत सब हिल गए हैं,
और खड़े ठूंठ तरु अंधड़ों में मिल गए हैं.

किंतु लचलचा जिह्वा करती सदा ही राज है,
और नत सफल दरख्तों के सर ही ताज है.

ज्ञान और मोक्ष की होती विनय से ही प्राप्ति है,
निहित इसी में सुख समृद्धि और ख्याति है.

अब जी रहा हूँ बस प्रभु मिलन के वास्ते ही,
हे प्रिय, ले चल मुझे विनय के रास्ते ही.


नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

Thursday, December 04, 2014

दिल बनारसिया- शिव के उत्तराधिकारी- बनारस राज

उन ख़ामोश पत्थरों में दफ़न थीं हज़ारों अनसुनी कहानियाँ जो सदियों सें गंगा की सुरमयी लहरों को निहारते उस किले में किसी निर्जीव की तरह जड़ दिए गए थे
चुनार के लाल पत्थर की आभा अब धूमिल हो चुकी थी। जो कुछ लाली बची थी वो खुद को सूर्यास्त के किरणों के साथ संवार रही थी, गंगा के दर्पण में खुद को निहार रही थी।  वो आज भी सीना तान खड़े होने की ज़ुर्रत में थी कि माँझी के पतवार ने उसके घमंड को अस्थिर कर दिया।  


काशी नरेश की ये कोठियां बनारस राज के शान की प्रतीक हैं। उस शाही झरोखे की तरफ़ आज भी उसी आदर सम्मान की तरह देखा जाता हैं जैसे कभी काशी नरेश को शिव का उत्तराधिकारी माना जाता था... और शायद आज भी।

इस बात का साक्षात प्रमाण है कि प्रत्येक वर्ष रामनगर की भव्य रामलीला का शुभारम्भ राजा साहब अपने हाथों सें करते थे। जिस तरह पुरी महाराज का महत्व रथयात्रा के लिये उसी तरह काशी नरेश रामलीला के लिये....वहीँ रुतबा, वहीँ शाही सवारी, वहीँ शानो शौकत...और वहीँ सजदे में झुकते दिल। 

 कहते हैं..... 
"The king is always a king whether he has his state or not. He was, he is and he will be the king in the heart of his people."

इतिहास के इन्हीं पलों को संजोये रामनगर का किला जर्जर लेकिन जर्रा जर्रा जीवित प्रतीत होता है। 

 
(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)
Facebook: www.facebook.com/aminesh.aryan


दिल बनारसिया की पहली कड़ी यहाँ पढ़ें- http://www.jeevanmag.com/2014/07/blog-post_16.html
दिल बनारसिया की दूसरी कड़ी यहाँ पढ़ें- http://www.jeevanmag.com/2014/09/dil-banarasiya-2.html

Monday, December 01, 2014

Secularism: The very spirit of India

I am Akash Kumar from India currently in the United States on KL-YES (Kennedy Lugar Youth Exchange and Study) program sponsored by the Department of State. In context to the International Education Week (November 17-21, 2014), we would be discussing the religions and the secular nature of India.

Coming from India- a country so rich and diverse in terms of culture instills in me a sense of sheer joy and pride. India boasts of a history several millennia old which helped shape its diverse culture. Four world religions- Hinduism, Buddhism, Jainism and Sikhism, have their roots in India. Buddhism and Jainism originated in the medieval period as modified forms of Hinduism. Sikhism came with the concept of universal brotherhood. Islam, Christianity and Zoroastrianism came to India in the first millennium CE. Secularism is at the heart of India. The Rigveda, a sacred text for Hindus and probably the oldest book in the history of mankind says: "Truth is one. God is one. But the sages refer to it in many ways. Our paths might be different, the destination is the same." Similar is the essence of Qur'an: "To you your religion and to me mine". India is an example to behold for the people who believe that religion comes with extremism. Despite the fact that people are highly religious, India not only by law but by its very nature is a secular nation.The banks of Holy River Ganga and Yamuna are testimony to our Indo-Islamic culture which is a perfect blend of the goodness of Hinduism and Islam. Taj Mahal, one of the Seven Wonders of the World is a perfect example of the Indo-Islamic architecture which blossomed with the intermingling of the cultures. Hindus join Muslims in Eid celebration and Muslims are ahead in savoring the joy of Diwali- that's the very Indian spirit. Christians make around 2% of the total population but Christmas is a public holiday. My town has just around 200 Christians out of its total population of 200,000. But, you'll have trouble finding empty space in the Churches on Christmas with people from all religions coming to light candles and celebrate the very joy.

A common identity for all- INDIAN
Religious diversity, co-existence and religious tolerance are both established in the country by the law and custom. And yes, it's not just tolerance, we are a step ahead with acceptance of each others' religious practices.  


(Akash Kumar is the Editor-in-chief of JeevanMag.com)
 
Useful Links (Click on the images)- 

http://www.afsusa.org

http://iew.state.gov
http://www.yesprograms.org



जो जहाँ से उठता है...(गुंजन श्री)

जो जहाँ से उठता है, वहीँ से टूट सकता है,
ज़रा बचके रहिये साहब, कोई भी लुट सकता है। 


बड़ा परेशां इन्सां है, अपने दिल की दुनिया से,
जो माने, मना लीजे, कोई भी छुट सकता है।

शिकस्त पाकर भी ख़ुश है, अजीब दुनियादारी है,
हार-जीत, हंसी-ख़ुशी, इनसे कोई भी रूठ सकता है...???



गुंजन श्री
युवा साहित्यकार
पटना (बिहार)

Thursday, November 27, 2014

देवताओं के एजेंडे (व्यंग्य)- संतोष



इवनिंग वाकिंग का भी अपना ही मज़ा है| साथ में अगर गप्पें मारने वाले मित्रगण हों तो समय से पहले ही चारों चाँद निकल आते हैं| होस्टल से कुछ ही आगे निकला की मेट्रो स्टेशन के पीछे “कृष्णभक्तों” की टोली दिखाई पड़ी| भक्तों की श्रध्दा देखिये आस-पास मुरली मनोहर की कोई प्रतिमा भी नहीं है ,पर हर किसी ने दिल में ही प्रभु को बसा लिया लगता है| ऐसा प्रतीत हो रहा था की वृन्दावन ही पहुँच गया हूँ| हर कोना कृष्णमय हो गया था| कृष्ण पेड़ की डाल पर बैठा करते थे ,पर कांटेदार पेड़ होने के कारण चबूतरों व सीढियों को ही यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा था| दूसरों की ख़ुशी से इंसान खुश होता है और दूसरों के दुःख से दुखी पर आज, अभी तक भगवन की भक्ति न मिलने के कारण दूसरे भक्तों से ईर्ष्या हो रही थी| आगे बढ़ते ही कक्कड़ की दुकान पर शिवभक्तों की मंडली नजर आई | डमरू और त्रिशूल के अलावे सब कुछ था भक्तों के पास| भक्तों की भीड़ व भक्ति इतनी की सब एक साथ अगर कैलाश पर्वत पहुँच जाय तो कैलाश का बर्फ भी पिघल जाय| मन ही मन सोचा की कैसे लोग अपने इष्टदेव का चयन करते होंगे? स्वत: ही संभावित उत्तर सूझा , शायद नेताओं की तरह भगवानों के भी अपने –अपने एजेंडे होते होंगे| जिसे जिनका एजेंडा पसंद आए उन्हें अपना लो| अगर ऐसा ही हो तो किनका एजेंडा सर्वाधिक लोकप्रिय होगा? जब वहां से आगे निकला तो दृश्य देख कर दंग रह गया| दिल्ली की इस कड़कड़ाती सर्दी में सड़क के किनारे कोई कपड़ों का एक चादर ओढ़े तो कोई अपनी खाल की चादर ओढ़े सोये थे| शायद इंद्रदेव अपना एजेंडा तय नहीं कर पाए थे| एक भी भक्त अपने पक्ष में न आते देख क्रोधवश हारे हुए नेता की तरह रात को वर्षा करा दी| तनिक भी न सोचा की ये बेचारे कहाँ जायेंगे| छप्पन करोड़ देवी-देवताओं में से किसी का भी एजेंडा अगर इन सड़क पर रात गुजारने के लिए नहीं है तो इन नेताओं से भला क्या आशा की जाये|
संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Monday, November 24, 2014

ये ज़िन्दगी- राधेश

क्या लिखूं और किसके बारे में लिखूं?
कभी सोचा नहीं था अपना ढोल अपने ही हाथों से पीटना पड़ेगा अर्थात् अपना परिचय स्वयं ही दूसरों को देना पड़ेगा।

"मिट्टी का तन,मस्ती का मन
क्षण भर जीवन, मेरा परिचय"


पर मैं वो बात किसी को कैसे बताऊं,जो मैं खुद नहीं जानता। हाँ चाहे कितनी भी बातें लिख लूं, पर सच यहीं है कि मैं नहीं जानता मैं कौन हूँ। कई बार सोचा, सवाल-ज़वाब का सिलसिला बंधा-टूटा, कई जवाब मिले, कई नये सवाल उठे, पर यह सवाल वहीं का वहीं है। मेरे मित्र ज़वाब देते हैं, तुम राधेश हो। पर ये तो मेरा नाम है। लोग कहते हैं,तुम मनुष्य हो पर, ये तो मेरी जाति है। कुछ ने कहा, तुम छात्र हो पर, ये तो मेरा व्यवसाय है। ये मेरा नाम, मेरी जाति, मेरा व्यवसाय मुझसे ही तो आस्तित्व में हैं, फ़िर ये मेरा परिचय कैसे हो सकते हैं। जिससे मेरा अस्तित्व हो, वहीं मेरा परिचय हो सकता है। तो फ़िर, मैं कौन हूँ और अगर मैं राधेश नहीं हूँ तो राधेश कौन है...मैं भूल रहा हूँ कि मेरा एक शरीर भी है, शायद उसी का नाम राधेश है, शायद वही मनुष्य भी है, क्योकि उसी के दो हाथ,दो पैर,हॄदय और मष्तिष्क भी हैं।

आईना जब गिरकर चूर हो जाता है,अपना स्वरूप खो देता है,तो फ़िर उसका नाम आईना नहीं रहता,उसे बस काँच का टुकड़ा कहा जा सकता है.आईना अपने स्वरूप के साथ नाम भी खो देता है। तो फिर ये शरीर,जिसका नाम राधेश है, ये भी तो एक दिन अपना स्वरूप खो देगा, उस दिन इसका नाम क्या होगा। …शायद राधेश ही। 

हे प्रभु! ये कैसा विरोधाभास है? स्वरूप खोने के बाद भी ये शरीर अपना नाम नहीं खो रहा है.... कहीं ऐसा तो नहीं, राधेश नाम इस शरीर का नहीं है.......तो फ़िर किसका है....... कुछ भी समझना मुश्किल है,कल भी मुश्किल था,आज भी। सवाल अभी भी वहीं खड़ा हैं, हँस रहा है मेरी बेबसी पर, अपने अविजित होने पर। हाँ,इसके अलावा मुझे थोड़ा बहुत पता है अपने बारे में। 

मेरी सहित्य में गहरी रुचि है. यहीं मेरे जीवन का आधार है, जीने का जज़्बा है, लक्ष्य है...अभी बहुत सफ़र तय करना है, कई मंज़िलों ,बाधाओं को पार करना है और अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना है। मेरा अन्तिम लक्ष्य उस सत्य को अनावृत्त करना है, जो अब तक सब की आँखों से ओझल है, क्योकि सत्य का अर्थ है,सतत् अर्थात सदा बना रहने वाला। मालूम नहीं ऐसा सत्य कहाँ मिलेगा, शायद भगवान के पास। और अन्त में, गाइड फ़िल्म के ये शब्द जो मेरी ज़िन्दगी का आधार बन गये हैं,
" सवाल अब ये नहीं कि पानी बरसेगा या नहीं, सवाल ये नहीं कि मैं जिऊँगा या मरूंगा. सवाल ये है कि इस दुनिया को बनाने वाला,चलाने वाला कोई है या नहीं. अगर नहीं है तो परवाह नहीं ज़िन्दगी रहे या मौत आये. एक अंधी दुनिया में अन्धे की तरह जीने में कोई मज़ा नहीं. और अगर है तो देखना ये है कि वो अपने मज़बूर बन्दों की सुनता है या नहीं "


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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ... 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
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राधेश कुमार  जीवन मैग के जनसम्पर्क अधिकारी हैं।

Tuesday, November 18, 2014

दूरदर्शन की सौतन- संतोष

एक समय था की जब दूरदर्शन ‘’सरकार’’ की छवि को लेकर उतनी ही चिंतित रहती थी जितनी की एक पत्नी अपने पति के लंचबॉक्स को लेकर | पूरे दिन निजी क्षेत्र की मीडिया द्वारा जब सरकार को पत्थर मारा जाता तब शाम को यह उस पर मरहम पट्टी का काम करती थी और धीरे से गुनगुनाती रहती ......
''बहुत रंजूर है ये, ग़मों से चूर है ये
खुदा का खौफ़ उठाओ, बहुत मजबूर है ये
क्यों चले आये हो बेबस पे सितम ढाने को
कोई पत्थर से ना मारे .........''


पहले सौतन का नाम ही पत्नी को जलाकर राख कर देती थी | उत्तर आधुनिक युग में अब सौतन की परिभाषा भी बदलने लगी है | अब की सौतने ख़ुशी- ख़ुशी साथ रहना पसंद करने लगी हैं | दूरदर्शन की सौतन भी अब सहेली बन गई है| दूरदर्शन की तो फिर भी कुछ सीमाएं हैं जैसे सुबह रंगोली, शाम को क्षेत्रीय प्रसारण, रात को अन्य विशेष कार्यक्रम इन सब की वजह से इसे उतना स्नेह नहीं मिल पता जितना की ये सौतनें इठला-इठलाकर लुटती रहती है | कभी प्रेमी के कुरते की तारीफ़ से तो कभी दाढ़ी के कलर पर बहस करा कर तो कभी ''सासु माँ'' का साक्षात्कार दिखा कर|

एक अलग नजरिये से देखें तो इन सब ने मिलकर दूरदर्शन का काम आसान ही कर दिया है , बेचारी अब कहाँ इन नवयुवतियों से रेस लगाती फिरे| और कलमुंही ये सौतनें........ये तो बस साबित कर देना चाहती हैं की वाकई ''हर सफल पुरुष के पीछे एक प्रेमिका का हाथ होता है"| ये जता देना चाहती हैं की ये जो तख्तो-ताज तुम्हे मयस्सर हुई है वह मेरे ही प्रेम, त्याग, और समर्पण का परिणाम है| दूरदर्शन बेफ़िक्र हो कर तमाशा देख रही है | इसे पता है की दो चार हसीन शाम गुजर जाने के बाद वापस तो इसे मेरे ही आँचल तले आना है| मगर वो कहते हैं न की प्यार अगर एकतरफा भी हो तो यादों को कौन मिटा सकता है ? फिर भी क्या खूब जिया है इस वक़्त को इन सौतनो ने! नये-नये सीरियल पुरे दिन दिखाएँ हैं कुछ का नाम इस प्रकार रखा जा सकता है ''कभी नरेन्द्र कभी मोदी'', ''ससुराल मोदी का ''. ''मोदी का घर प्यारा लगे'', मोदी बधू'', ''सपने सुहाने मोदी के'', ''नरेन्द्र मोदी का उल्टा चश्मा'' तथा ''क्योंकि मोदी भी कभी C.M था''!
125 करोड़ की आबादी में दुर्भाग्यवश औसतन 125 चेहरे को मीडिया तरज़ीह देती है| दस-पंद्रह फ़िल्मी कलाकारों, दस-पंद्रह उद्योगपति औसतन सत्तर-पचहत्तर नेताओं को फिर ब्रेक में जाने के बाद अगर समय बच जाए तो उन बदनसीबों को भी दिखा देते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है या जो किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं और दुर्भाग्यवश अगर रैली का दिन ठहरा तो करमजले को वो भी नसीब नहीं होता| 


संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Saturday, November 15, 2014

ग़ज़ल: एक दिन- राघव

ज़मीन-ओ-आसमां, और अपनी नज़रों का जहाँ

कर चलेंगे ये सभी तेरे हवाले एक दिन |

वो जो बाक़ी रह गया था रहज़नों से सफ़र में,

राह्बरों ने छीन लिए उनसे निवाले एक दिन |

इन परिंदों से कहो ये सच की धुन को ना कहें

कर के बदनां शज्र इनके लोग जलाएंगे एक दिन |

तुम ये चेहरा क्या दिखाते धूप में झुलसा हुआ?

तुमको दिखलाएंगे हम पैरों के छाले एक दिन |

डर नहीं ये मेरे दुश्मन क़त्ल को बेताब हैं

ग़म है मुझको मेरे अपने मिटाएंगे एक दिन |

आइनों को देख कर चेहरों को चमका लिया

आइनों पे दाग़ को अब मिटाएंगे एक दिन

अब भी खतरे में है सच, सुकरात अब भी मरते हैं

बदले में ये नादां, ज़हर पिलाएंगे एक दिन

ठोकरों से एक ना एक दिन हम संभलना सीख लेंगे,

कोई तो एक बार आकर , हमें संभाले एक दिन |

मैं हार तो गया हूँ पर जद्दोजहद पर अब भी हूँ

देखना दी जाएँगी 'राघव' की मिसालें एक दिन। 



राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक जीवन मैग के संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं तथा ग़ज़ल में गहरी रूचि रखते हैं.)
(संपादन में अतिरिक्त प्रयत्न के लिए जीवनमैग के सह-संपादक अबूज़ैद अंसारी को धन्यवाद सहित)


 Roman Text: Ghazal- Ek Din

Zameen-o-asman aur apni nazron ka jahan
kar chalenge ye sabhi tere hawale ek din
wo jo baaki reh gaya tha rahjanon se safar me,
 rahbaron ne chheen liye unse niwale ek din
in parindon se kaho ye sach ki dhun ko naa kahen
kar ke badnan shazr inke log jalayenge ek din
tum ye chehra kya dikhate dhoop me jhulsa hua?
 tumko dikhayenge hum pairon ke chhale ek din
dar nahi ye mere dushman katl ko betaab hain
gham hai mujhko mere apne mitayenge ek din

aainon ko dekh kar chehron ko chamka liya
aainon pe daag ko ab mitayenge ek din
ab bhi khatre me hai sach, sukrat ab bhi marte hain
badle me ye naadan, zahar pilayenge ek din
thokron se ek naa ek din ham sambhalna seekh lenge
koyi to ek baar aakar, hamen sambhaale ek din
main haarf to gaya hoon par jaddojahad par ab bhi hoon
dekhna dee jayengi "raghav" ki misalen ek din

- Raghavendra Tripathi "Raghav"

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