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Monday, April 29, 2013

नारी- ममता किरण


वह नर पशु निरा समान,
करता नहीं जो सम्मान,
नारी को प्रताड़ित करता,
जग में करता उसका अपमान।
समय बदल गया,
संदर्भ बदल गया,
बदला इनका अभिमान।
अतिशयता की सीमा कर पार,
ये कर रहे हैं दुराचार।
मौन हैं जब तक, बचे हैं तब तक।
तन जायेंगी जिस दिन‍-
ये तन्वियाँ;       
नाश पाप का कर करेंगी,
दुष्ट प्रवृतियों का संहार।
रोक सकेगा इनको‍-
कोई बल,
छल सकेगा इनको-
कोई छल,
बदलेंगी जब ये हवाएँ,
बदलेंगी तब ये मानसिकताएँ।
मुस्कुरा उठेंगी‍-
ये जीवनदायिनी,
जो करती सृष्टि का निर्माण;
निर्माण की जो दुर्गा हैं,
जो इनको निर्मित करती हैं,
क्यों नहीं-
नर करते इनका सम्मान।
ममता किरण 
शोधार्थी (हिन्दी)
बिहार विवि, मुज॰

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